भूले-बिसरे सभी पितरों का श्राद्ध होता है पितृ विसर्जन पर!

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
अपने पितरों का पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण के लिए सबसे उत्तम समय पितृ विसर्जन अमावस्या है। आश्विन मास की अमावस्या तिथि 21 सितंबर 2025 को रात 12 बजकर 16 मिनट पर प्रारंभ होकर 22 सितंबर 2025 को देर रात 1 बजकर 23 मिनट तक रहेगी। पंचांग के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या रविवार, 21 सितंबर को मनाई जाएगी

अमावस्या श्राद्ध – 21 सितम्बर 2025, रविवार
कुतुप मूहूर्त – 11:50 पूर्वान्ह से 12:38 अपरान्ह
रौहिण मूहूर्त – 12:38 अपरान्ह से 01:27 अपरान्ह
अपराह्न काल – 01:27 अपरान्ह से 03:53 अपरान्ह
अमावस्या तिथि प्रारम्भ – सितम्बर 21, 2025 को 12:16 बजे
अमावस्या तिथि समाप्त – सितम्बर 22, 2025 को 01:23 पूर्वान्ह बजे
जिनको अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि नहीं पता है वे सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध करते हैं। इस दिन पितरों को विदाई दी जाती है। इसलिए इसे पितृ विसर्जन अमावस्या पर्व कहा जाता है। मान्यता है कि जिनके पूर्वज श्राद्ध ग्रहण कर खुशी-खुशी परमधाम लौटते हैं, उनके घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। पितृ विसर्जन के दिन पितरों की विदाई श्रद्धाभाव से करनी चाहिए।पितृ विसर्जन पर्व पर प्रातः काल स्नान करने के बाद पीपल के पेड़ के पास पितरों का ध्यान करते हुए गंगा जल, काला तिल, चीनी, चावल, सफेद पुष्प अर्पित करते हुए ऊं पितृभ्यः नमः मंत्र का जाप करना चाहिए, इसके बाद पितृ सुक्त का पाठ करें और अपने पितरों से उनके प्रति की गई किसी भी गलती या भूल के लिए क्षमा याचना करे।सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों के लिए तरह-तरह व्यंजन बनाकर पितरों का तर्पण करे और फिर ब्राम्हणों को भोजन कराएं।

इस दिन किसी भिखारी को दरवाजे से किसी को खाली हाथ न जाने दें। यदि घर पर कोई भिखारी आता है तो उसका इज्जत सत्कार करते हुए उसे भोजन कराकर जरुरत की वस्तुएं दान दें। इस दिन घर पर या घर के आस-पास रहने वाले जानवरों को भोजन कराएं। मान्यता है कि इस दिन जो लोग श्रद्धा भाव से पितरों का तर्पण करते हैं उन पर पितृ प्रसन्न रहते हैं।सर्वपितृ अमावस्या को उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु अमावस्या को होती है। वहीं जिन लोगों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती है उन लोगों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान भी सर्वपितृ अमावस्या को किया जाता है।इसीलिए सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध पक्ष में बहुत ही विशेष माना गया है।इस दिन उन महिलाओं का भी श्राद्ध करने की परंपरा है, जिनकी मृत्यु सौभाग्यवती रहते हुए हो जाती है।वैसे महिलाओं के लिए नवमी तिथि को अहम माना गया है। नवमी की तिथि को विवाहित महिलाओं का श्राद्ध करने का विधान है।
इस अमावस्या को मोक्षदायिनी अमावस्या भी कहते हैं।इस बार की सर्वपितृ अमावस्या पर बहुत ही शुभ संयोग बन रहा है। इस बार अमावस्या के दिन शनिवार होने के कारण इसे शनिचरी अमावस्या भी कहा जा रहा है। इस दिन साल का अंतिम सूर्य ग्रहण लग रहा है। इस अवसर पर शुभ इंद्र योग भी है। सर्वपितृ अमावस्या अश्विन माह में पड़ने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। श्राद्ध पर्व परमेश्वर की रची हुई माया का एक अंश है, जिसके द्वारा वे सभी प्राणियों के साथ अपना कौतुक करते हैं। ये सभी प्राणियों को अपने शरीर से ही प्रकट करते हैं और पुनः अपने में ही विलीन कर लेते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के कालखंड को ही जीवन कहते है।

जिसको जीव प्रति कल्प अपने कर्मों के अनुसार भोगता है। जन्म लेने के बाद जो जीव परमेश्वर को याद रखते हैं वे कालान्तर में पुनः उन्हीं में विलीन हो जाते हैं अर्थात मोक्ष प्राप्त कर लेते है और जो मार्ग से भटक जाते हैं, उन्हें पुनः जन्म लेना पड़ता है। जिस प्रकार यात्रा करते समय मार्ग का सही पता न होने के कारण हम मार्ग भूलकर आगे निकल जाते हैं और किसी और से रास्ता पूछकर वापस लौटते हैं, उसी प्रकार यह भी एक जीवन यात्रा है।प्राणियों को मोक्ष लिए परमेश्वर ने छियानबे पर्व बनाए हैं।

इनमें बारह महीने की बारह अमावस्या, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के प्रारम्भ की चार तिथियां, मनुवों के आरम्भ की चौदह मन्वादि तिथियां, बारह संक्रांतियां, बारह वैधृति योग, बारह व्यतिपात योग, पंद्रह महालय-श्राद्ध पक्ष की तिथियां, पांच अष्टका, पांच अन्वष्टका और पांच पूर्वेद्युह ये श्राद्ध करने छियानबे अवसर निहित हैं। जिनमें अलग-अलग तीर्थों, नदियों, गया तथा बद्रीनाथ में पिंडदान या फिर तर्पण किये जा सकते हैं।देवताओं के पितृगण ‘अग्निष्वात्त’ व सोमपथ की मानस कन्या अच्छोदा ने एक हज़ार वर्ष तक निर्बाध तपस्या की थी, उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर दिव्य शक्ति परायण देवताओं के पितृगण अच्छोदा को वरदान देने के लिए दिव्य सुदर्शन शरीर धारण कर आश्विन अमावस्या के दिन उपस्थित हुए थे।

उन पितृगणों में ‘अमावसु’ नाम के एक अत्यंत सुंदर पितर की मनोहारी-छवि यौवन और तेज देखकर अच्छोदा कामातुर हो गयीं और उनसे प्रणय निवेदन करने लगीं किन्तु अमावसु अच्छोदा की कामप्रार्थना को ठुकराकर अनिच्छा प्रकट की जिससे अच्छोदा अति लज्जित हुई और स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरीं। अमावसु के ब्रह्मचर्य और धैर्य की सभी पितरों ने सराहना की एवं वरदान दिया कि, यह तिथि ‘अमावसु’ के नाम से जानी जाएगी।इसी कारण इस पर्व को पवित्रता का पितृ विसर्जन पर्व माना जाता है।

(लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ पत्रकार है)
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की, उत्तराखंड
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