आईआईटी गुवाहाटी की क्रांतिकारी खोज: इंसुलिन उत्पादन की नई किफायती तकनीक पर दो पेटेंट, मधुमेह रोगियों को मिलेगी बड़ी राहत

गुवाहाटी।आईआईटी, गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने मानव इंसुलिन के उत्पादन के लिए एक सुरक्षित और कम लागत वाली जीवाणु-आधारित प्रणाली विकसित की है। इस अभिनव तकनीक के लिए उन्हें दो भारतीय पेटेंट मिले हैं, जो करोड़ों मधुमेह रोगियों के लिए सस्ते और सुलभ इलाज का रास्ता खोल सकती है। यह प्रणाली स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस नामक जीवाणु का उपयोग करती है, जो इंसुलिन को बड़ी मात्रा में और घुलनशील रूप में उत्पादित करती है।

शोध टीम का नेतृत्व बायोसाइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. वीरंकी वेंकट दासू ने किया। टीम में पीएचडी छात्र अंशुमान साहू, प्रबीर कुमार दास, डॉ. एमएसआरसी मूर्ति और प्रो. संजुक्ता पात्रा शामिल हैं। पेटेंट नंबर 568947 (आवेदन संख्या: 202431045821, अनुदान: 22 जुलाई 2025) और 536416 (आवेदन संख्या: 202331058235, अनुदान: 1 मई 2024) इस तकनीक की वैज्ञानिक मजबूती को साबित करते हैं। शोध के परिणाम ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोमॉलेक्यूल्स’ और ‘जर्नल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में 53.7 करोड़ से ज्यादा वयस्क मधुमेह से पीड़ित हैं, और 2050 तक यह संख्या आठ में से एक व्यक्ति तक पहुंच सकती है। इंसुलिन टाइप-1 और टाइप-2 मधुमेह के लिए जीवनरक्षक है, लेकिन मौजूदा उत्पादन विधियां—जैसे ई. कोलाई जीवाणु पर आधारित—महंगी और जटिल हैं। ये विधियां इंसुलिन को अघुलनशील गांठों में बदल देती हैं, जिससे शुद्धिकरण की लागत बढ़ जाती है। यीस्ट या स्तनधारी कोशिकाओं वाली वैकल्पिक प्रणालियां भी सीमित साबित हुई हैं।

आईआईटी गुवाहाटी की टीम ने इन चुनौतियों का सामना करते हुए स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस—एक बीएसएल-1 स्तर का सुरक्षित जीवाणु—को चुना, जो प्रोटीन को घुलनशील रूप में उत्पन्न करता है। यह पहली बार है जब इस जीवाणु से मानव इंसुलिन का उत्पादन सफलतापूर्वक किया गया। टीम ने आनुवंशिक, चयापचयी और जैवरासायनिक इंजीनियरिंग का संयोजन कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रणाली बनाई, जो विषाक्त प्रेरकों की बजाय खाद्य-ग्रेड यौगिकों पर निर्भर है। इससे इंसुलिन के अलावा अन्य चिकित्सीय प्रोटीन और एंजाइमों का उत्पादन भी आसान हो सकता है।

शोध प्रमुख डॉ. वीरंकी वेंकट दासू ने बताया, “यह नई प्रणाली इंसुलिन उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस से हम घुलनशील इंसुलिन का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकते हैं—बिना हानिकारक उप-उत्पादों के। यह मौजूदा तरीकों से ज्यादा किफायती और पर्यावरण-अनुकूल है।”

पीएचडी छात्र अंशुमान साहू ने कहा, “पारंपरिक ई. कोलाई प्रणालियां इंसुलिन को गांठों में फंसा देती हैं, जिससे प्रसंस्करण मुश्किल होता है। हमारी तकनीक घुलनशील प्रोटीन देती है, शुद्धिकरण सरल बनाती है और लागत घटाती है। मशीन लर्निंग से माध्यम अनुकूलन कर हमने उत्पादन 19 गुना बढ़ाया है।”

मौखिक इंसुलिन जैसी नई वितरण विधियों की बढ़ती मांग के साथ इंसुलिन की जरूरत और तेज हो रही है। यह नवाचार विकासशील देशों में मधुमेह के बढ़ते बोझ को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा, जहां सस्ते स्वास्थ्य समाधान की सख्त जरूरत है। आईआईटी गुवाहाटी का यह योगदान न सिर्फ भारत, बल्कि वैश्विक मधुमेह प्रबंधन को मजबूत करेगा।

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