सत्यनारायण मिश्र
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियाँ, विशेष रूप से उनकी “अमेरिका फर्स्ट” नीति और टैरिफ युद्ध, और फिर कभी भारत जैसे सार्वभौम और अब रूस जैसी ताकत को धमकी वैश्विक मंच पर चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। भारत जैसे देशों पर 50% तक टैरिफ और रूस के साथ व्यापार को लेकर दबाव डालने वाली उनकी नीतियाँ न केवल भू-राजनीतिक समीकरणों को बदल रही हैं, बल्कि अमेरिका के दीर्घकालिक हितों के लिए भी जोखिम पैदा कर रही हैं। क्या ट्रंप का यह दृष्टिकोण अमेरिका को फिर से “महान” बनाए रहेगा, या यह “खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे” की तर्ज पर एक हताश कदम है, जो अमेरिका को वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर देगा?
टैरिफ युद्ध: आर्थिक जोखिम
ट्रंप ने भारत, चीन, कनाडा, और मेक्सिको जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाकर वैश्विक व्यापार को हथियार बनाया है। भारत पर 50% टैरिफ और रूस से तेल खरीदने के लिए अतिरिक्त जुर्माने ने दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाया है। लेकिन यह नीति अमेरिका के लिए भी दोधारी तलवार साबित हो सकती है। टैरिफ से आयातित सामान महँगा होगा, जिससे अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। साथ ही, भारत और चीन जैसे देशों के जवाबी टैरिफ (चीन ने 125% टैरिफ लगाया था) से अमेरिकी निर्यात, विशेष रूप से कृषि और प्रौद्योगिकी क्षेत्र, प्रभावित हो सकते हैं।
अमेरिकी अर्थशास्त्री मिताली निकोरे ने चेतावनी दी है कि भारत जैसे देशों पर टैरिफ से फार्मा, टेक्सटाइल, और स्टील जैसे क्षेत्र प्रभावित होंगे, लेकिन इसका असर अमेरिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी पड़ेगा। उदाहरण के लिए, भारत से सस्ती दवाइयों पर निर्भर अमेरिकी स्वास्थ्य क्षेत्र को नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, ट्रंप की नीतियों ने शेयर और बांड बाजारों में अस्थिरता पैदा की है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है।
*सहयोगियों से दूरी: भू-राजनीतिक नुकसान*
ट्रंप की नीतियाँ न केवल व्यापारिक, बल्कि भू-राजनीतिक स्तर पर भी अमेरिका को अलग-थलग कर रही हैं। भारत जैसे रणनीतिक साझेदार पर दबाव डालना, जैसे रूस से तेल खरीदने पर जुर्माना, नई दिल्ली को BRICS देशों (रूस, चीन, आदि) के और करीब ला रहा है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट में पीएम मोदी, पुतिन, और शी जिनपिंग की सौहार्द्रपूर्ण मुलाकात ने ट्रंप को भारत को “चीन के हाथों खोने” की चिंता जताने पर मजबूर किया।
इसके अलावा, ट्रंप का दोहरा मापदंड भी सवालों के घेरे में है। एक ओर वह भारत और अन्य देशों पर रूस के साथ व्यापार के लिए जुर्माना लगा रहे हैं, वहीं अमेरिका स्वयं रूस के साथ 2024 में 30,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार कर चुका है। यह पाखंड अमेरिका की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और भारत जैसे देशों को वैकल्पिक गठबंधनों की ओर धकेलता है।
*BRICS और बहुध्रुवीय विश्व का उदय*
ट्रंप की नीतियाँ अनजाने में एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा दे रही हैं। भारत, रूस, और चीन जैसे BRICS देश अब डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। रूस और चीन पहले ही रूबल और युआन में व्यापार बढ़ा रहे हैं, और भारत भी इस दिशा में कदम उठा सकता है। यह अमेरिकी डॉलर के वैश्विक वर्चस्व के लिए खतरा है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
चीन ने ट्रंप के टैरिफ युद्ध में कूटनीतिक जीत हासिल की है, यूरोप और आसियान देशों के साथ अपने व्यापार को बढ़ाकर। भारत भी अब यूरोपीय संघ और अन्य बाजारों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर ध्यान दे रहा है, लेकिन ट्रंप की नीतियों ने इस प्रक्रिया को तेज करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
*आंतरिक चुनौतियाँ: घरेलू असंतोष*
ट्रंप की नीतियाँ घरेलू मोर्चे पर भी जोखिम पैदा कर रही हैं। उनके आप्रवासन विरोधी कदम, जैसे H-1B वीजा पर अंकुश और विदेश भेजे जाने वाले डॉलर पर 5% कर का प्रस्ताव, भारतीय-अमेरिकी समुदाय को प्रभावित कर सकता है। यह न केवल भारत-अमेरिका संबंधों को तनाव देगा, बल्कि अमेरिका में तकनीकी क्षेत्र, जो भारतीय पेशेवरों पर निर्भर है, को भी नुकसान पहुँचाएगा।
इसके अतिरिक्त, ट्रंप के विवादास्पद बयान, जैसे मेक्सिको की खाड़ी को “गल्फ ऑफ अमेरिका” नाम देना, और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करना, उनकी छवि को ध्रुवीकृत कर रहे हैं। यह 2026 के मध्यावधि चुनावों में उनकी पार्टी के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
भारत के लिए अवसर
ट्रंप की नीतियाँ भारत के लिए एक दोहरी स्थिति पैदा करती हैं। एक ओर, टैरिफ और प्रतिबंध भारत के निर्यात और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। दूसरी ओर, यह भारत के लिए अपनी स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने और वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरने का अवसर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने स्वदेशी पर जोर देते हुए कहा कि “दबाव में व्यापार नहीं किया जाता।” भारत ने भी रूस से तेल खरीदना जारी रखने का फैसला किया है, जो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है।
निष्कर्ष रूप से- ट्रंप की नीतियाँ अल्पकाल में अमेरिका को आर्थिक और राजनीतिक लाभ दे सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में ये अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व को कमजोर कर रही हैं। सहयोगियों से दूरी, BRICS जैसे गठबंधनों का उदय, और आंतरिक असंतोष अमेरिका के लिए भविष्य की मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं। जैसा कि शुरुआत में “खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे” का उल्लेख है, ट्रंप की नीतियाँ उनकी अपनी कूटनीतिक असफलताओं को छिपाने का प्रयास हो सकती हैं। भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को मजबूत करे, लेकिन इसके लिए सतर्कता और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है। ट्रंप की नीतियां खुद उनके मुल्क के लिये भी मुसीबत बन सकती हैं। एक नई विश्व व्यवस्था की नींव रखती दिख रही हैं, जिसमें अमेरिका की सर्वशक्तिमान स्थिति पहले जैसी नहीं रह सकती।