ट्रंप की “कूट” कूटनीति: नव्य वैश्विक व्यवस्था का स्वप्न या रणनीतिक अराजकता?

"दगाबाज तेरी बतियां न मानूं रे"

सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत नीति, विशेष रूप से 2025 में उनकी टैरिफ वृद्धि, रूस से तेल खरीद को लेकर धमकाना और फिर भारत को “खास दोस्त” बताने की खोखली बयानबाजी, वैश्विक कूटनीति में एक नए युग की शुरुआत महसूस हो रही है। कोई इसे ट्रंप के “करामाती दिमाग” का परिणाम मान सकते हैं, जो अप्रत्याशितता और दबाव की रणनीति के साथ वैश्विक शक्ति संतुलन को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन क्या यह वास्तव में एक नव्य वैश्विक कूटनीति है, या यह पुरानी “अमेरिका फर्स्ट” नीति का आक्रामक विस्तार मात्र है? इस आलेख के माध्यम से ट्रंप की नीतियों, भारत-अमेरिका संबंधों, और वैश्विक कूटनीति पर इसके प्रभाव के एक गहन विश्लेषण के साथ भारत के लिए इसके अवसरों और चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला गया है।

ट्रंप की कूटनीति: नवाचार या अराजकता?
ट्रंप की कूटनीति की पहचान उनकी अप्रत्याशितता और व्यक्तिगत शैली है। एक दिन वे भारत पर 50% टैरिफ लगाने की धमकी देते हैं, भारत की अर्थव्यवस्था को “मृत” कहते हैं, और रूस से तेल खरीदने को यूक्रेन युद्ध से जोड़ते हैं; अगले ही दिन वे भारत को “दोस्त” और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “शानदार नेता” बताते हैं। यह दोहरा रवैया उनकी रणनीति का मूल है, जिसे कुछ लोग “करामाती” कह सकते हैं, क्योंकि यह विरोधियों को भ्रम में रखता है और बातचीत के लिए दबाव बनाता है।

नवाचार के संकेत
टैरिफ का हथियारीकरण: ट्रंप ने टैरिफ को केवल आर्थिक उपकरण नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हथियार बनाया है। भारत पर 50% टैरिफ (चीन पर 30% और अन्य देशों पर 15-20% की तुलना में) और रूस से तेल खरीद पर जुर्माने की धमकी, उनकी “मेक इन अमेरिका” नीति को वैश्विक स्तर पर लागू करने की कूट चेष्टा है। यह वैश्विक व्यापार नियमों को चुनौती देता है और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे संस्थानों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाता है।
नया शक्ति संतुलन: ट्रंप की नीतियां एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को खारिज करती दिखती हैं। उनकी चीन के प्रति नरमी और भारत-पाकिस्तान संतुलन की कोशिश (पाकिस्तान पर 19% टैरिफ बनाम भारत पर 50%) एक नई बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर इशारा करती है, जहां अमेरिका केवल अपने हितों के आधार पर गठबंधनों को पुनर्परिभाषित करता है।
व्यक्तिगत कूटनीति: ट्रंप की “हाउडी मोदी” और “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों में गर्मजोशी, और फिर सख्त बयानबाजी, उनकी व्यक्तिगत ब्रांडिंग का हिस्सा है। यह कूटनीति पारंपरिक राजनयिक औपचारिकताओं से हटकर है और सीधे जनता व नेताओं को संबोधित करती है।

पुरानी रणनीति का विस्तार
हालांकि, ट्रंप की नीतियां उनके पहले कार्यकाल (2017-2021) की निरंतरता हैं। तब भी उन्होंने भारत पर स्टील और एल्यूमिनियम टैरिफ लगाए थे, और भारत ने जवाब में जवाबी टैरिफ लागू किए थे। उनकी ईरान नीति में भी दबाव और सौदेबाजी का मिश्रण था। वर्तमान नीतियां अधिक आक्रामक हैं, लेकिन मूल में वही “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण है, जो वैश्विक सहयोग के बजाय एकतरफा लाभ पर केंद्रित है।
द इकोनॉमिस्ट ने इसे “25 साल की भारत-अमेरिका कूटनीति को नष्ट करने वाला” बताया है, जो दर्शाता है कि यह कोई नया दृष्टिकोण नहीं, बल्कि पुरानी रणनीति का अतिवादी रूप है।

भारत-अमेरिका संबंध: दोस्ती का मायाजाल
ट्रंप और मोदी के बीच व्यक्तिगत दोस्ती ने भारत-अमेरिका संबंधों को एक प्रतीकात्मक मजबूती दी थी। 2019 के “हाउडी मोदी” और 2020 के “नमस्ते ट्रंप” आयोजनों ने इस गर्मजोशी को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया। लेकिन 2025 में यह दोस्ती तनाव के दौर से गुजर रही है। ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने भारत पर “यूक्रेन युद्ध के लिए जिम्मेदार” होने का बेतुका आरोप लगाया, और ट्रंप ने भारत को “टैक्स किंग” और “दोहन करने वाला” कह डाला।

दोस्ती बनाम राष्ट्रहित
व्यक्तिगत संबंध: ट्रंप ने बार-बार मोदी को “दोस्त” और भारत को “रणनीतिक साझेदार” कहा है। लेकिन उनकी नीतियां इस दोस्ती को व्यावहारिक समर्थन नहीं देतीं। उदाहरण के लिए, भारत पर 50% टैरिफ और रूस से तेल खरीद पर धमकी, जबकि चीन पर नरमी, यह दर्शाता है कि ट्रंप की प्राथमिकता अमेरिकी हित हैं, न कि दोस्ती।
रणनीतिक साझेदारी: भारत और अमेरिका के बीच क्वाड, रक्षा सहयोग, और 212 अरब डॉलर का व्यापार (2024) महत्वपूर्ण है। लेकिन ट्रंप की नीतियां, जैसे दवा उद्योग पर 200% टैरिफ की धमकी, भारत के फार्मास्यूटिकल और टेक्सटाइल निर्यात को प्रभावित कर सकती हैं, जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं।
मोदी का जवाब: मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप ने हाल में चार बार मोदी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन मोदी ने कॉल नहीं उठाया। यह भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” और ट्रंप की दबाव नीति को खारिज करने का संकेत है।

3. वैश्विक कूटनीति पर प्रभाव: नया युग या अस्थिरता?
क्या ट्रंप की नीतियां एक नई वैश्विक कूटनीति की शुरुआत हैं? कुछ तर्क इसे समर्थन देते हैं:
बहुध्रुवीय दुनिया: ट्रंप की नीतियां एकध्रुवीय अमेरिकी वर्चस्व को कमजोर कर रही हैं, जिससे भारत, चीन, और रूस जैसे देशों को वैकल्पिक गठबंधनों (जैसे BRICS और SCO) में सक्रिय होने का मौका मिल रहा है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की नीतियां अनजाने में “अधिक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था” को बढ़ावा दे रही हैं।
आर्थिक राष्ट्रवाद: ट्रंप की “मेक इन अमेरिका” नीति भारत की “मेक इन इंडिया” से मेल खाती है, जिससे दोनों देश आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रहे हैं। यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को पुनर्गठित कर सकता है।
चीन के साथ नरमी: ट्रंप की चीन पर 30% टैरिफ (भारत पर 50% की तुलना में) और 90-दिन के व्यापारिक विराम ने चीन को कूटनीतिक जीत दिलाई है। यह एक नए वैश्विक संतुलन का संकेत हो सकता है, जहां अमेरिका भारत जैसे सहयोगियों पर दबाव डालता है, लेकिन चीन को रियायत देता है।

हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं, बल्कि अराजकता है। ट्रंप की नीतियां वैश्विक मंदी की आशंका बढ़ा रही हैं। टैरिफ ने वैश्विक व्यापार में रुकावटें पैदा की हैं, जिससे निवेश और खपत प्रभावित हो रही है। इसके अलावा, ट्रंप की नीतियां सहयोगियों को अलग कर रही हैं, जिससे वैश्विक स्थिरता कमजोर हो रही है।

4. भारत की रणनीति: अवसर और चुनौतियां
ट्रंप की नीतियां भारत के लिए चुनौतियां और अवसर दोनों ला रही हैं।
चुनौतियां
आर्थिक प्रभाव:
50% टैरिफ ने भारत के शेयर बाजार और निर्यात (विशेष रूप से दवा और तांबा) को प्रभावित किया है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा दवा बाजार है, जहां 2025 में 9.8 अरब डॉलर का निर्यात हुआ। 200% टैरिफ की धमकी इसे और नुकसान पहुंचा सकती है।
भू-राजनीतिक दबाव:
ट्रंप की रूस नीति भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। रूस से सस्ता तेल (वैश्विक मूल्य से 4-5 डॉलर प्रति बैरल कम) भारत की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान कारक:
ट्रंप की पाकिस्तान के प्रति नरमी (19% टैरिफ) और भारत-पाक युद्धविराम का दावा भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती है।

अवसर
वैकल्पिक बाजार:
भारत ने टैरिफ के जवाब में नए निर्यात बाजारों (जैसे खाड़ी देश और आसियान) की तलाश शुरू की है। सरकार ने वस्त्र निर्यात के लिए नए गंतव्यों की पहचान की है।
BRICS और SCO:
ट्रंप की नीतियों ने भारत को रूस और चीन के साथ सहयोग बढ़ाने का मौका दिया है। तियानजिन में SCO शिखर सम्मेलन में मोदी, पुतिन, और जिनपिंग की मुलाकात ने वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को मजबूत किया।
आत्मनिर्भरता:
ट्रंप की नीतियां भारत को स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता पर जोर देने के लिए प्रेरित कर रही हैं। भारतीय उपभोक्ता अमेरिकी ब्रांड्स का बहिष्कार कर स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा दे सकते हैं।

 निष्कर्ष: नव्य कूटनीति या रणनीतिक भटकाव?
ट्रंप की नीतियां एक “नव्य वैश्विक कूटनीति” की शुरुआत कम, और रणनीतिक अराजकता का परिणाम ज्यादा प्रतीत होती हैं। उनकी अप्रत्याशितता और दबाव की रणनीति अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकालिक वैश्विक स्थिरता को नुकसान पहुंचा रही है। भारत के लिए यह एक दोधारी तलवार है: एक ओर, टैरिफ और दबाव आर्थिक और कूटनीतिक चुनौतियां ला रहे हैं; दूसरी ओर, यह भारत को वैकल्पिक गठबंधनों और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का अवसर दे रहा है।

मोदी की रणनीतिक चुप्पी और BRICS-SCO जैसे मंचों पर सक्रियता दर्शाती है कि भारत ट्रंप की “करामाती” कूटनीति का जवाब अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” से दे रहा है।
हिंदी फिल्मी गाना “दगाबाज तेरी बतियां न मानूं रे” ट्रंप की नीतियों पर सटीक बैठता है। लेकिन भारत की कूटनीति “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” की भावना को बनाए रखते हुए, राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रही है। भविष्य में, भारत को अपनी आर्थिक लचीलापन, वैश्विक गठबंधनों, और कूटनीतिक संतुलन को और मजबूत करना होगा, ताकि ट्रंप की अराजकता को अवसर में बदला जा सके।

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