असम में कहां से आ गए कुल आबादी से तीन फीसदी अधिक लोग

जबकि अभी भी नहीं बन पाए बड़ी संख्या में आधार कार्ड

क्यों राज्य सरकार को लगानी पड़ी नए आधार कार्ड पर रोक
सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
गुवाहाटी। असम सरकार ने अवैध घुसपैठ, विशेष रूप से बांग्लादेशी नागरिकों की बढ़ती संख्या के खिलाफ अपने कड़े रुख को और गहरा कर 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए नए आधार कार्ड जारी करने पर रोक लगाकर नया हंगामा खड़ा कर दिया है। पहले से ही 20000 से अधिक एक समुदाय विशेष के लोग संरक्षित वनांचलों और सरकारी जमीनों पर बेदखली अभियान के बाद प्रभावित हो चुके हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इन तमाम लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे जाएंगे। नए आधार कार्ड पर रोक को कथित विदेशियों के खिलाफ हल्लाबोल के तौर पर रेखांकित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि राज्य में आधार कार्ड सेचुरेशन 103% तक पहुंच चुका है।

जबकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और चाय बागान समुदाय के तकरीबन 4 प्रतिशत लोग अभी भी आधार कार्ड नहीं बनवा सके। इनके लिए एक साल का समय और दिया गया है। अन्य वर्गों के लिए सितंबर 2025 तक आवेदन की अंतिम खिड़की खुली रहेगी।
मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व सरमा के मुताबिक सितंबर के बाद केवल अति दुर्लभ मामलों में जिला आयुक्त(डीसी) और विदेशी न्यायाधिकरण(फारेन ट्रिब्यूनल) की सत्यापन रिपोर्ट के आधार पर ही नया आधार कार्ड जारी हो सकेगा। यह निर्णय अवैध प्रवासियों का भारतीय नागरिकता का दावा रोकने को लिया गया है। असम में आधार कार्ड का उपयोग कर घुसपैठिये अन्य जरूरी दस्तावेज, यहां तक कि पासपोर्ट भी हासिल कर लेते हैं।

भविष्य में आधार कार्ड केवल उन लोगों को जारी होंगे, जिनके पास राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) की रसीद होगी।
असम की भाजपा सरकार के इस फैसले से राज्य के विपक्षी खेमे में उबाल है। एआईयूडीएफ ने इसे तुगलकी फरमान करार देते हुए कहा कि यह नीति कुछ समुदायों को मतदान के अधिकारों से वंचित कर सकती है।
दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि बरपेटा, धुबड़ी, मोरिगांव और नगांव जैसे कई जिलों में वहां की आबादी से काफी अधिक आधार कार्ड बन चुके हैं। इसे बांग्लादेश से होने वाले समुदाय विशेष के लोगों की अवैध आबादी से जोड़कर देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि राज्य की हिमंत बिश्व सरमा सरकार ने हाल ही में उरियामघाट में लगभग 12,000 बीघा जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया और वहां वृक्षारोपण की योजना बनाई है, जो सीमा सुरक्षा को मजबूत करने का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं है, जिससे राज्य सरकार की इस नीति को कानूनी समर्थन मिलता है।
सरकार यह बताने की कोशिश कर रही है कि उसकी यह नीति असम की जनसांख्यिकीय संरचना को नियंत्रित करने और अवैध प्रवास पर अंकुश लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, वास्तविक नागरिकों, खासकर ग्रामीण और दस्तावेजों की कमी वाले लोगों को इस निर्णय से काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री ने आधार कार्ड पर रोक को सही ठहराते हुए कहा है कि राज्य की कुल आबादी से ज्यादा आधार कार्ड बन चुके हैं! ऐसे में हमें (शासन को) नयी पीढ़ी और मैट्रिक परीक्षा तक के लोगों को आधार कार्ड देना होगा। मैं यदि आज पैदा हुआ हूं, कल पैदा हुआ हूं, किसी कारण आधार नहीं ले सका।

यह बात तो समझ में आती है। किंतु 18 वर्ष तक आधार नहीं लेकर रहने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। ऐसे में यदि किसी एक खास आबादी के लोग आधार लेना चाहें तो स्पष्ट रूप से उन्हें नया आया हुआ होना चाहिए। इसलिये हम इस समय 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों के लिये आधार कार्ड लेने पर रोक लगा रहे हैं। केवल एससी/एसटी और टी-ट्राइब्स को छोड़ कर। इनके 4प्रतिशत के पास आधार कार्ड नहीं हैं। इसलिये इन्हें एक साल का अतिरिक्त समय दे रहे हैं। और इसी के साथ, अन्य वर्ग के भी कुछ लोग आधार कार्ड नहीं ले सके तो उनके लिये भी एक माह (सितंबर) तक का समय दे रहे हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.