इधर आफत, उधर सियासत

मुट्ठीभर भाजपाई मुख्यमंत्री के खिलाफ लामबंद!

सियासी दांव पेंच के बीच भी सीएम धामी आपदा प्रभावितों की सुध लेने में जुटे

-ममता सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।

नई दिल्ली/ देहरादून। कई मंचों पर प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री धामी के बीच शानदार बॉन्डिंग बताती है कि उन्हें पीएम मोदी का आशीर्वाद प्राप्त है। इसके अलावा एक के बाद एक महत्वपूर्ण फैसले लेने और उन्हें अमल में लाने के मुख्यमंत्री धामी के अंदाज को शीर्ष स्तर पर पसंद किया जा रहा है। और यह बात भी काबिले गौर है कि भाजपा मुख्यमंत्रियों में अब तक केवल धामी ही अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनका कार्यकाल सबसे ज्यादा है। इसलिए उत्तराखंड के वरिष्ठ भाजपाइयों को यह बात भी नहीं सुहा रही है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि ऐन मुसीबत के वक्त उनके खिलाफ सियासत भी तेज हो जाती है यानी ‘इधर आफत, उधर सियासत’।

” खेल ” करने में लगे कुछ वरिष्ठ दिग्गज

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच निरंतर हो रही यह मिलनी-जुलनी “अपनों” को भी रास नहीं आ रही है। इसलिए इस श्रेणी में शामिल भाजपाई दिग्गज एकजुट होकर मुख्यमंत्री के खिलाफ लामबंद हो गए हैं! गजब है कि इस बार भी मुख्यमंत्री के खिलाफ जबरन का माहौल ऐसे वक्त में रणनीति के तहत तैयार किया जा रहा है जब पूरा उत्तराखंड आपदा से त्रस्त है और सबकी नजरें अमेरिका के भारत पर जबरन थोपे गए टैरिफ पर है। और नया भाजपा अध्यक्ष न मिलने से संगठन स्तर पर भी मौजूदा समय में कोई सख्त आदेश आने की संभावना नहीं दिख रही।

सीएम का आपदा प्रबंधन पर विशेष फोकस

राजनीति के जानकारों की मानें तो मुख्यमंत्री के विरोधी उनके खिलाफ देहरादून से दिल्ली तक अफवाह फैलाने में व्यस्त रहे, जबकि मुख्यमंत्री आपदाग्रस्त क्षेत्रों में डटे रहे। देश-दुनिया में यह संदेश भी हवा के झोंके तरह फैला कि उत्तराखंड की सियासत में अपनी ही सरकार के खिलाफ अपने ही लोग सरकार को डिस्टर्ब करने में ऐसे समय जुटे हुए हैं, जब पूरा प्रदेश आपदा की चपेट में है। मुख्यमंत्री सहित पूरी सरकार आपदा पीड़ितों के पास पहुंच कर उनके हौसले बढ़ाने के साथ हर संभव राहत पहुंचाने में जुटी रही। इस क्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ऐलान भी किया कि आपदा प्रभावितों के लिए नई पुनर्वास नीति बनेगी।

धामी की थ्योरी युवा नेताओं के लिए कारगर

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी राजनीति के मंझे हुए ‘खिलाड़ी’ हैं। धामी ने बीते चार सालों में अपने आप को उत्तराखंड की राजनीति में एक खास जगह बना ली है। पुष्कर सिंह धामी का यह दौर उत्तराखंड की राजनीति में नयापन लेकर आया है। बीते पंचायत और निकाय चुनावों में जो आगामी विधान सभा के सेमीफाइनल के रूप में देखा जा रहा है, उसमें बड़े पैमाने पर कर्मठ और जुझारू जमीनी युवा नेताओं का उभार तो कम से कम यही संकेत दे रहा है। इन सबके बीच मुख्यमंत्री उत्तराखंड की राजनीति में एक ऐसी पारी प्ले करते हुए नजर आ रहे हैं जिसमें आरएसएस और भाजपा की पूरी की पूरी थ्योरी समाहित नजर आ रही है। असल में धामी ने एक बड़ी लकीर खींच दी है जो भविष्य में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

ओछी राजनीति से प्रदेश की छवि धूमिल

अन्य पर्वतीय राज्यों या फिर मैदानी राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड की तुलना की जाए तो मौजूदा परिस्थितियों में देवभूमि की स्थिति काफी ठीक है। न ऐसा कोई बड़ा अपराध और न ही कोई भ्रष्टाचार दिखाई पड़ रहा है जिससे उत्तराखंड की छवि खराब होती दिख रही हो। लेकिन कुछ दिग्गज नेता उक्त बातों से सहमत नहीं हैं और वे बदलाव को बेहतर विकल्प मान कर चल रहे हैं। यानी राज्य की चिंता करना तो अच्छी बात है। ऐसे में उन नेताओं को तो बिना देर किए सलाहकार मंडल में शामिल कर देना चाहिए। ताकि वे जहां-तहां टीका टिप्पणी करने के बजाय उचित मंच पर सरकार को सुझाव दें और सरकार इनके सुझावों पर अमल भी करे। ताकि न ही प्रदेश का माहौल खराब हो और न ही पार्टी का।

राज्य का पक्ष केन्द्र के समक्ष रखें सांसद

आशय यह है कि सभी का फोकस विकास पर ही होना चाहिए। प्रदेश का विकास होगा तभी खुशहाली आएगी। हालांकि उत्तराखंड तो पूरी तरह से आपदा प्रदेश है। यहां सीमित संसाधन हैं और इसी में सरकार को हर तरह के कार्य करने पड़ते हैं। यह तो काफी अच्छी बात है कि राज्य और केंद्र दोनों ही जगह भाजपा की सरकार है। केंद्र की ओर से भी मदद मिलता रहेगा। हां, इस कड़ी में सांसदों की भूमिका भी काफी बढ़ जाती है। उन्हें चाहिए कि वे केन्द्र सरकार को भ्रमित करने के बजाए राज्य का पक्ष केन्द्र के समक्ष रखें ताकि केंद्रीय बजट, समय पर राज्य सरकार को मिले और राज्य सरकार केंद्रीय बजट का इस्तेमाल विकास से जुड़ी योजनाओं पर करे।

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