आशीष सिंह।
गैरसैंण। उत्तराखंड विधानसभा का मानसून सत्र, जिसे चार दिनों तक चलना था, महज डेढ़ दिन में निपटा दिया गया। बुधवार दोपहर को सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर कोई ठोस चर्चा नहीं हो सकी और पूरा सत्र बजट और कुछ विधेयकों को पारित करने तक ही सीमित रह गया।
सत्र की शुरुआत से ही माहौल तनावपूर्ण रहा। विपक्ष कांग्रेस ने कानून-व्यवस्था और आपदा प्रबंधन पर चर्चा की मांग की, लेकिन सत्ता पक्ष ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। विपक्ष हंगामा करता रहा और सत्ता पक्ष जल्दी सत्र खत्म करने की रणनीति पर चलता रहा। नतीजतन, पूरा सत्र केवल 2 घंटे 40 मिनट ही चल सका।
इस सत्र को लेकर जनता में गहरी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि जब विधानसभा सत्र सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए करना था, तो इसके लिए गैरसैंण जाने की जरूरत ही क्या थी। यह काम देहरादून विधानसभा में भी हो सकता था। लेकिन दिखावे के लिए भारी भरकम खर्च के साथ गैरसैंण में सत्र आयोजित किया गया।
बताया जा रहा है कि कई मंत्री और अधिकारी हेलीकॉप्टर से गैरसैंण पहुंचे, जबकि कर्मचारियों और विधायकों को 8-9 घंटे का लंबा सफर सड़क मार्ग से तय करना पड़ा। इसके बावजूद नतीजा शून्य रहा। जनता से जुड़े मुद्दों — बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था — पर कोई गंभीर बहस नहीं हुई।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गैरसैंण में सत्र आयोजित करना महज दिखावे की राजनीति बनकर रह गया है। नेताओं के लिए यह पहाड़ी कस्बा सुविधाओं से दूर और कठिन परिस्थितियों वाला क्षेत्र है, इसलिए वे यहां ठहरना पसंद नहीं करते। यही कारण है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का मुद्दा वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा है।
विपक्ष कांग्रेस का रुख भी कमजोर रहा। सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने की जगह कांग्रेस हंगामे में उलझी रही और जनता के मुद्दों पर गंभीर बहस कराने में असफल रही। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका सवालों के घेरे में है।
निष्कर्षतः, गैरसैंण में आयोजित यह मानसून सत्र सिर्फ पिकनिक स्पॉट जैसा आयोजन साबित हुआ। दो दिन में जनता के करोड़ों रुपये खर्च हो गए, लेकिन राज्य को कोई ठोस नतीजा नहीं मिला। यह घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि नेताओं की प्राथमिकताओं में जनता के मुद्दों की जगह सुख-सुविधाएं ही हावी हैं।