देहरादून। सिडार संस्था और दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र द्वारा 1 अगस्त 2025 को “मानव-तेंदुए संघर्ष के सामाजिक-पारिस्थितिक और भू-स्थानिक आयाम” विषय पर एक गोलमेज बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में विशेषज्ञों ने जोर दिया कि मानव और वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए दोनों की जरूरतों और कमजोरियों को समझना आवश्यक है।
बैठक की शुरुआत पारिस्थितिकी विज्ञानी प्रोफेसर एस.पी. सिंह और सिडार के प्रभारी डॉ. विशाल सिंह ने की। उन्होंने कहा कि जानवरों को भी पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न हिस्सा मानना होगा। शहरीकरण के कारण इंसानों और वन्यजीवों के बीच भौतिक अलगाव बढ़ रहा है।
प्रो. दीप्तो सरकार (कार्लटन विश्वविद्यालय) ने युगांडा के किबाले नेशनल पार्क के सफल संरक्षण कार्यक्रम का उदाहरण पेश किया और भारत में तकनीक आधारित संरक्षण तंत्र विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सह-अस्तित्व ही दीर्घकालिक समाधान है।
एम.आर. इशान खोसला (यूपीईएस टाइपक्राफ्ट इनिशिएटिव) ने लोक एवं जनजातीय कलाकारों के सहयोग से वन्यजीव संरक्षण पर काम करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि वन्यजीवों को सांस्कृतिक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत करना उनके संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
डॉ. हिमानी नौटियाल (हावर्ड विश्वविद्यालय) ने दीर्घकालिक परियोजनाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि तेंदुओं के हमलों का समाधान केवल मुआवजा नहीं हो सकता, बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और सुरक्षा उपाय भी जरूरी हैं।
बैठक में तकनीक आधारित चेतावनी प्रणाली, सुरक्षात्मक ढाँचे, स्थानीय समुदायों के साथ सहयोगात्मक योजनाएँ, नागरिक विज्ञान, वन विभाग की क्षमता बढ़ाने और नई पीढ़ी को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करने जैसे सुझाव दिए गए।
कार्यक्रम में बिजू नेगी, डॉ. मालविका चौहान, रेनू सुयाल, निधि सिंह, कुलदीप उनियाल, अंलति भरतरी, डॉ. प्रदीप मेहता, अश्विनी पुरी, पंकज जोशी और अमित भाकुनी सहित कई विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।
बैठक का निष्कर्ष था कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए तकनीकी नवाचार, सामुदायिक सहभागिता और दीर्घकालिक योजनाओं की आवश्यकता है।