देहरादून: चाय बागानों की भूमि पर हो रही खेती पर हाईकोर्ट सख्त, रिपोर्ट तलब

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून के चाय बागानों की भूमि पर गन्ना, खीरा और तरबूज जैसी फसलों की खेती को लेकर दायर जनहित याचिका पर गंभीर सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने राज्य सरकार और याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या इस भूमि पर चाय के अलावा अन्य फसलों की खेती के लिए टी बोर्ड (Tea Board) और केंद्र सरकार की अनुमति ली गई है। कोर्ट ने 1953 के टी एक्ट के अनुपालन को लेकर भी सवाल उठाए।

याचिका का विवरण

देहरादून के विकासनगर निवासी देवानंद ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर बताया कि विकासनगर क्षेत्र को चाय बागान के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया गया है। इस क्षेत्र में केवल चाय की खेती की अनुमति है और अन्य फसलों की खेती पर रोक है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने कहा कि हाल के वर्षों में इस प्रतिबंधित क्षेत्र की जमीन पर गन्ना, खीरा, तरबूज सहित अन्य सीजनल फसलों की खेती की जा रही है, जिससे चाय बागानों की प्राकृतिक विरासत और अस्तित्व को गंभीर खतरा पहुंचा है।

देवानंद ने कोर्ट से आग्रह किया कि चाय की भूमि को उसकी ऐतिहासिक और पर्यावरणीय अहमियत के तहत संरक्षित किया जाए और केवल चाय की खेती के लिए ही इसका उपयोग सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, याचिका में कहा गया कि टी एक्ट 1953 के प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है, जिसके तहत चाय के लिए निर्धारित भूमि का गलत उपयोग रोका जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने उठाए महत्वपूर्ण सवाल

सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र ने कहा कि चाय बागानों की जमीन पर किसी भी प्रकार की खेती के लिए टी बोर्ड और केंद्र सरकार की अनुमति जरूरी है। उन्होंने पूछा कि क्या राज्य सरकार ने इस अनुमति के बिना गन्ना, खीरा और तरबूज जैसी फसलों की खेती को अनुमति दी है? न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि अनुमति नहीं ली गई है तो यह गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।

न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने भी कहा कि चाय की खेती की भूमि को उसकी पारंपरिक और आर्थिक भूमिका के अनुसार ही संरक्षित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे इस मामले में स्पष्ट रिपोर्ट प्रस्तुत करें कि क्या टी बोर्ड से अनुमति प्राप्त की गई है और क्या राज्य सरकार ने इस भूमि का गलत उपयोग होने दिया है।

टी एक्ट 1953 और उसका महत्व

टी एक्ट 1953 चाय बागानों और चाय की खेती से जुड़ी भूमि की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बनाया गया था। इसके अंतर्गत चाय की खेती के लिए जमीन की पहचान की जाती है और इस भूमि पर अन्य कृषि कार्यों या निर्माण की अनुमति नहीं दी जाती। इस एक्ट का उद्देश्य चाय की गुणवत्ता और उत्पादन को बनाए रखना है, जो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि चाय बागानों की भूमि का अन्य फसलों के लिए उपयोग इस क्षेत्र की जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है, जिससे लंबी अवधि में कृषि और पर्यटन उद्योग को भी नुकसान होगा।

राज्य सरकार की भूमिका और जवाबदेही

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा कि क्या उन्होंने इस प्रकार की खेती को बढ़ावा दिया है या इसके लिए अनदेखी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि अनुमति के बिना फसलों की खेती हो रही है तो उसे तत्काल रोका जाना चाहिए। साथ ही, कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आगामी सुनवाई में विस्तृत जवाब और कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।

चाय बागानों का आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व

देहरादून के चाय बागान न केवल क्षेत्र की आर्थिक धुरी हैं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये बागान न केवल स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का स्रोत हैं, बल्कि क्षेत्र की जलवायु और पारिस्थितिकी को बनाए रखने में भी मददगार साबित होते हैं। अतः इन बागानों की भूमि का संरक्षित रहना आवश्यक है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड हाईकोर्ट की यह सुनवाई चाय बागानों की भूमि संरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम है। यह मामला न केवल कृषि कानूनों और टी एक्ट के अनुपालन की जांच कर रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों की सुरक्षा के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकता है।

राज्य सरकार और संबंधित विभागों के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे चाय बागानों की भूमि के संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाएं और गैरकानूनी खेती पर रोक लगाएं। आगामी सुनवाई में कोर्ट के निर्देशानुसार विस्तृत रिपोर्ट की उम्मीद है।

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