डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
देश मे विमान तो दो दशक से भी अधिक पुराने चल रहे है लेकिन सड़क पर चलने वाले वाहन यदि डीजल के है तो अधिकतम 10 वर्ष और यदि पैट्रोल के है तो अधिकतम 15 साल ही चल सकते है,फिर चाहे उनकी कंडीशन कितनी भी अच्छी क्यो न हो,उन्हें कबाड़ में बेचना ही होगा।सरकार के इस निर्णय को लेकर देशभर के वाहन स्वामियों में आक्रोश व्याप्त है।दिल्ली में 10 साल पुराने डीजल वाहनों को कबाड़ में बदलने के नियम के तहत उन्हें ईंधन न देने का तुगलकी फरमान जारी किया गया ,जो 2 दिन बाद ही वापस लेना पड़ा है।
इस नियम के लागू होने से वाहन मालिकों ने गुस्सा दिखाया कि दिल्ली सरकार को 2 दिन में ही घुटने टेकने पड़े है, क्योंकि उन्हें अपनी अच्छी हालत वाली गाड़ियों को कबाड़ में बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कार मालिक सवाल उठा रहे हैं कि जब उनकी गाड़ियां अच्छी स्थिति में हैं, तो उन्हें कबाड़ में क्यों बदला जा रहा है? वे भारत सरकार के इस फैसले पर हैरानी जता रहे हैं।
इस फैसले से पहले ही, कार मालिकों पर गाड़ियों के रखरखाव और टैक्स का बोझ है। अब उन्हें अपनी गाड़ियों को कबाड़ में बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिससे वाहन स्वामियों की परेशानी और बढ़ गई है।वाहन स्वामियों का कहना है कि सरकार का यह फैसला मनमाना है और इससे सार्वजनिक परिवहन की कमी जैसी समस्याओं का समाधान नहीं होगा।उनका कहना है कि उनकी गाड़ियां अच्छी हालत में हैं और उन्हें प्रदूषण का कारण नहीं माना जा सकता। उनका सवाल है कि जब अन्य देशों में पुराने वाहनों को अनुमति है, तो भारत में ऐसा क्यों नहीं है?
वाहन मालिक चाहते हैं कि सरकार इस नियम पर पुनर्विचार करे और उनकी परेशानियों को कम करने के लिए पुराने वाहनों को फिटनेस के बाद अनुमति दे।उनका सवाल है क्या मेहनत की कमाई से खरीदी गई गाड़ी सिर्फ इसलिए जब्त की जा सकती है क्योंकि वह 10 या फिर 15 साल पुरानी हो गई है?
आंकड़ों के अनुसार,अकेले दिल्ली में लगभग 62 लाख से अधिक गाड़ियाँ इस नीति के दायरे में आती हैं, जिनमें से अधिकांश तकनीकी रूप से पूरी तरह चालू और प्रदूषण मानकों के अनुसार फिट है,फिर भी उम्र का हवाला देकर उन्हें कबाड़ माना जा रहा है।
लोगो में यह आम धारणा बन रही है कि पर्यावरण के नाम पर जनता से उनकी अच्छी कंडीशन की गाड़ियां कबाड़ के भाव छीनी जा रही है, जबकि इसके पीछे की वास्तविक मंशा वाहन कंपनियों को नया व्यापार दिलाना और स्क्रैपिंग से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देना है। सन 2015 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश के तहत दिल्ली में 10 साल से अधिक पुरानी डीज़ल और 15 साल से अधिक पुरानी पेट्रोल गाड़ियाँ सड़क पर नहीं चलने का फरमान जारी किया गया था। इसे लागू करते समय किसी गाड़ी की तकनीकी स्थिति या प्रदूषण स्तर की जांच नहीं की गई, बल्कि केवल “उम्र” को आधार बनाया गया।
न्यायमूर्ति स्वातंत्र कुमार का विवादित अतीत
इस आदेश के खिलाफ कई वाहन मालिकों और जनप्रतिनिधियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।लेकिन कोई राहत वाहन स्वामियों को नही मिल पाई।सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने इस नीति को लेकर कई अहम दलीलें प्रस्तुत कीं। उन्होंने कहा कि यह एक मनमाना निर्णय बताया है, जिसमें केवल वाहन की उम्र को देखते हुए उसे सड़कों से हटाया जा रहा है, जबकि उसकी फिटनेस, रखरखाव और प्रदूषण स्तर को नजरअंदाज किया जा रहा है।
यह तर्क उठता है कि यदि गाड़ी फिटनेस और प्रदूषण जाँच पास कर रही है, तो केवल उम्र के आधार पर उसे कबाड़ घोषित करना एक तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से अधूरी नीति ही कही जाएगी ।
इस नीति से सर्वाधिक लाभ वाहन निर्माता कंपनियों को हो रहा है, जिनकी नई गाड़ियों की बिक्री में अचानक तेज़ी देखी गई। साथ ही स्क्रैपिंग इंडस्ट्री, वाहन डीलरों और कुछ अफसरशाही तंत्र को भी इससे नया अवसर मिला, जिससे वे आर्थिक रूप से सशक्त हुए। दूसरी ओर, इसका सबसे बड़ा बोझ मध्यम वर्गीय परिवारों, टैक्सी चालकों, सीमित आय वाले निजी वाहन मालिकों पर पड़ा, जिनके लिए हर 10 या 15 साल में नई गाड़ी खरीदना संभव नहीं है। यह नीति एक प्रकार से संपत्ति के हस्तांतरण की ऐसी व्यवस्था बनती जा रही है जिसमें मेहनतकश वर्ग से धन निकालकर धनाढ्य वर्ग को सौंपा जा रहा है।
भारत में प्रतिवर्ष लगभग 35 लाख से अधिक पेट्रोल व डीज़ल गाड़ियाँ बिकती हैं, यह नीति यदि वाकई पर्यावरण के हित में थी तो इसमें यह प्रावधान हो सकता था कि हर गाड़ी का तकनीकी परीक्षण हो, यदि वह फिटनेस और प्रदूषण जांच में सफल हो, तो उसे 5 वर्षों का विस्तार दिया जाए।
(लेखक ज्वलंत मुद्दों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार है)