दलाई लामा का उत्तराधिकारी और अरुणाचल प्रदेश – भारत-चीन तनाव का केंद्र बिंदु

सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार

भारत का अपूर्व प्राकृतिक सुषमा से भरा राज्य अरुणाचल प्रदेश, विशेष रूप से तवांग, तिब्बती बौद्ध धर्म और भारत-चीन भू-राजनीति के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है। 14वें दलाई लामा ने हाल ही में घोषणा की कि उनका उत्तराधिकारी गदेन फोडरंग फाउंडेशन द्वारा तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार चुना जाएगा और संभवतः भारत, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्र में उनका पुनर्जन्म होगा। इस घोषणा ने तिब्बती समुदाय में एकजुटता को मजबूत किया है, लेकिन चीन की उस नीति को चुनौती दी है, जो दलाई लामा के उत्तराधिकारी को नियंत्रित कर तिब्बत पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। इससे अरुणाचल प्रदेश, जिसे चीन “दक्षिणी तिब्बत” कहता है, को लेकर भारत-चीन संबंधों में नया तनाव उत्पन्न होने की आशंका है।

अरुणाचल प्रदेश: तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्र

अरुणाचल प्रदेश का तवांग क्षेत्र तिब्बती बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र है। 17वीं सदी में स्थापित तवांग मठ तिब्बत के बाहर सबसे बड़ा बौद्ध मठ है, और छठे दलाई लामा, त्संगयांग ग्यात्सो, का जन्म यहीं हुआ था। दलाई लामा की घोषणा कि उनका उत्तराधिकारी भारत में, संभवतः तवांग जैसे क्षेत्र में, जन्म ले सकता है, ने इस क्षेत्र को धार्मिक और भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से और महत्वपूर्ण बना दिया है।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के अध्यक्ष पेनपा त्सेरिंग ने कहा है कि “तवांग तिब्बती बौद्ध धर्म का एक ऐतिहासिक केंद्र है। दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन में इस क्षेत्र की भूमिका हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को संरक्षित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।” तिब्बती समुदाय में यह विश्वास प्रबल है कि अरुणाचल में पुनर्जन्म उनकी स्वतंत्रता और पहचान को मजबूत करेगा।

चीन की प्रतिक्रिया: अरुणाचल पर दावा और बढ़ता दबाव

चीन ने दलाई लामा की घोषणा को खारिज करते हुए इसे “अवैध” करार दिया। चीनी विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी “स्वर्ण कलश” प्रक्रिया और केंद्रीय सरकार की मंजूरी के बिना वैध नहीं होगा। यह रुख अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावों से गहराई से जुड़ा है, जिसे वह “दक्षिणी तिब्बत” कहता है। मई 2025 में, चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नाम बदलने की कोशिश की, जिसका भारत ने कड़ा विरोध करते हुए कहा, “नाम बदलने से सच्चाई नहीं बदलेगी।”

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के चीनी अध्ययन विशेषज्ञ प्रोफेसर बीआर दीपक ने चाइना-इंडिया डायलॉग में कहा है कि”चीन-भारत संबंधों का सामान्यीकरण संवाद और विश्वास पर निर्भर करता है, लेकिन अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चीन की आक्रामकता तनाव को बढ़ा सकती है।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारत-चीन संबंधों में तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे ऐतिहासिक और समकालीन संदर्भों में जटिल हैं, और चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावों को मजबूत करने के लिए दलाई लामा के उत्तराधिकारी के मुद्दे का उपयोग कर सकता है।

भारत का रुख: अरुणाचल की रक्षा और तिब्बती समुदाय का समर्थन

भारत ने इस मुद्दे पर दृढ़ रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनना तिब्बती बौद्ध परंपराओं का आंतरिक मामला है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजु ने कहा है कि, “तवांग का सांस्कृतिक और रणनीतिक महत्व भारत के लिए अपरिहार्य है। हम दलाई लामा की परंपराओं में किसी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा ने तिब्बत पॉलिसी इंस्टीट्यूट (टीपीआई) में अपने व्याख्यान में कहा, “चीन दलाई लामा की उत्तराधिकार योजना के माध्यम से तिब्बत पर अपने शासन को वैध बनाने का प्रयास कर रहा है। भारत को मानवाधिकार परिषद में तिब्बत के मुद्दे को और मुखरता से उठाना चाहिए।” उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को तिब्बत नीति में अपनी स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए, विशेष रूप से अरुणाचल जैसे क्षेत्रों में, जहां धार्मिक और रणनीतिक हित एक साथ आते हैं। भारत को चीन के मानवाधिकार उल्लंघनों, विशेष रूप से तिब्बत में, पर टिप्पणी करने से बचना नहीं चाहिए।

अरुणाचल-केंद्रित दृष्टिकोण का महत्व

अरुणाचल प्रदेश पर ध्यान केंद्रित करना इस मुद्दे के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र तिब्बती बौद्ध धर्म का ऐतिहासिक केंद्र होने के साथ-साथ भारत-चीन सीमा विवाद का एक प्रमुख बिंदु है। तवांग में दलाई लामा के संभावित उत्तराधिकारी का पुनर्जन्म भारत के लिए धार्मिक और रणनीतिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह भारत को तिब्बती समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने और चीन के क्षेत्रीय दावों को चुनौती देने का अवसर देता है।

चीन का संभावित दांव: अरुणाचल और नेपाल

चीन ने हाल के वर्षों में अरुणाचल प्रदेश सीमा पर बुनियादी ढांचे को तेजी से विकसित किया है, जिसमें सड़कें, हवाई पट्टियां और सैन्य चौकियां शामिल हैं। दलाई लामा के उत्तराधिकारी के मुद्दे की आड़ में चीन तवांग में अपनी सैन्य गतिविधियों को बढ़ाने का बहाना तलाश सकता है। साथ ही, नेपाल में चीन की बढ़ती पैठ, विशेष रूप से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत, तिब्बती शरणार्थियों पर दबाव बढ़ा सकती है। नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों को दलाई लामा की तस्वीरें प्रदर्शित करने से रोकने के लिए चीनी दबाव की खबरें पहले भी सामने आ चुकी हैं।

तिब्बती समुदाय: अरुणाचल प्रदेश में एकजुटता

अरुणाचल प्रदेश के तवांग में बौद्ध समुदाय और निर्वासित तिब्बतियों ने दलाई लामा की घोषणा का स्वागत किया है। तवांग के एक भिक्षु लोबसांग तेनजिन ने कहा कि “अरुणाचल हमारी धार्मिक पहचान का प्रतीक है। यदि 15वें दलाई लामा यहाँ जन्म लेते हैं, तो यह हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई को नई ताकत देगा।” तिब्बती समुदाय की यह एकजुटता भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर है, क्योंकि यह वैश्विक मंच पर तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे को उठाने का मौका देता है।

कुल मिलाकर दलाई लामा के उत्तराधिकारी का मुद्दा अरुणाचल प्रदेश को भारत-चीन तनाव का एक नया केंद्र बना सकता है। तवांग का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व, चीन के क्षेत्रीय दावे, और भारत की दृढ़ प्रतिक्रिया इस क्षेत्र को एक जटिल भू-राजनीतिक शतरंज का मैदान बनाते हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर भारत को इस मुद्दे पर एक स्पष्ट और दृढ़ नीति अपनानी होगी। भारत के लिए यह न केवल तिब्बती समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करने का अवसर है, बल्कि अरुणाचल प्रदेश की संप्रभुता को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का मौका भी है। हालांकि, चीन की आक्रामक रणनीति—चाहे वह अरुणाचल प्रदेश से लगे सीमा क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों के रूप में हो या नेपाल में कूटनीतिक दबाव के रूप में—भारत के लिए चुनौतियां बढ़ा सकती है। भारत को सावधानीपूर्वक कूटनीति और मजबूत सैन्य तैयारियों के साथ इस चुनौती का सामना करना होगा।

Leave A Reply

Your email address will not be published.