राजेंद्र शर्मा
योगी आदित्यनाथ ने ऐन विधानसभा में उर्दू के खिलाफ अपनी नफरत की उल्टी से, मुस्लिम विरोधी नफरत के अपने इजहार को, एक सीढ़ी और ऊंचा कर दिया। मुख्यमंत्री योगी ने शुरूआत तो की उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी सपा पर यह कहकर हमला करने से कि, ‘समाजवादियों का चरित्र दोहरा हो चुका है, ये अपने बच्चों को पढ़ाएंगे इंग्लिश स्कूल में और दूसरों के बच्चों के लिए कहेेंगे उर्दू पढ़ाओ’। उर्दू का नाम आने भर की देर थी, वह फट पड़े कि ये तो ‘उसको मौलवी बनाना चाहते हैं, कठमुल्लापन की ओर देश को ले जाना चाहते हैं’ आदि-आदि।
प्रसंग था, उत्तर प्रदेश में विधायिका की कार्रवाई में कई क्षेत्रीय भाषाओं के शामिल किए जाने के योगी सरकार के फैसले का। जैसा कि इस सरकार के रुख को देखते हुए आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था, विधायिका की कार्रवाई में शामिल किए जाने का यह फैसला, उर्दू को छेककर चलता है। स्वाभाविक रूप से जैसाकि अपेक्षित था, विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता, समाजवादी पार्टी के माता प्रसाद पांडेय ने उर्दू के साथ इस सौतेले सुलूक पर विरोध जताया। उनका सुझाव था कि सदन में आधिकारिक रूप से मान्यताप्राप्त भाषाओं में अंग्रेजी की जगह उर्दू को कर दिया जाए। उर्दू उत्तर प्रदेश की दूसरी राजकीय भाषा भी है।
बेशक, सपा नेता के इस तर्क पर तो बहस हो सकती है कि ‘अंग्रेजी की जरूरत नहीं है’ और उसकी जगह पर उर्दू को रखा जाए, जिस पर मुख्यमंत्री योगी भड़क उठे। लेकिन, योगी का विस्फोट उर्दू को लाने के लिए अंग्रेजी को हटाए जाने के सुझाव पर उतना नहीं था, जितना उर्दू को शामिल किए जाने की मांग पर था। अगर उनकी प्रतिक्रिया के पीछे मुख्यत: विधायी काम की भाषा के रूप में अंग्रेजी को बनाए रखने की चिंता होती, तो मुख्यमंत्री आसानी से अंग्रेजी को बनाए रखते हुए भी, उर्दू के शामिल किए जाने की मांग को मंजूर कर सकते थे। आखिरकार, विधायी कार्य के लिए मान्यता प्राप्त भाषाओं की कोई पहले तयशुदा संख्या तो है नहीं कि अंग्रेजी को हटाकर ही उर्दू को जगह दी जा सकती हो। बात इससे उल्टी थी। योगी सरकार सोच-समझकर, क्षेत्रीय भाषाओं के इस समावेश के जरिए, उर्दू की उपेक्षा करने का संदेश देना चाहती थी और इसीलिए, मुख्यमंत्री ने सीधे उर्दू भाषा और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक उपयोगिता पर ही हमला बोल दिया।
योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह उर्दू की पढ़ाई-लिखाई को मौलवी बनाने तक सीमित करने की ही कोशिश नहीं की है, बल्कि ‘कठमुल्लापन की ओर देश को ले जाना चाहते हैं’ की दिशा में अपने हमले को आगे भी बढ़ाया है, उसमें नया कुछ भी नहीं है। उत्तर प्रदेश की भाषा की राजनीति में भाजपा और उसके पूर्ववर्ती जनसंघ, हमेशा से उर्दू का इसके बावजूद विरोध करते आए हैं कि उर्दू इसी प्रदेश में जन्मी यानी सिर्फ एक भारतीय भाषा ही नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की भी अपनी भाषा है। आरएसएस-भाजपा की सांप्रदायिक भाषायी राजनीति, ब्रिटिश हुकूमत के जमाने से उर्दू को एक ओर तो मुसलमानों तक सीमित करने की कोशिश करती आयी है और दूसरी ओर, उसे शिक्षा-संस्कृति के विकास के लिए अनुपयोगी करार देकर, खत्म ही करने की कोशिश करती आयी है। यह एक प्रकार से वैसा ही तर्क है, जिस तरह का तर्क बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए ठीक इन्हीं ताकतों द्वारा प्रचारित किया गया था—वह तो मस्जिद थी ही नहीं, इसलिए उसे ढहाया जा सकता था। उसी तरह, उर्दू की कोई सामाजिक-सांस्कृतिक उपयोगिता ही नहीं है, इसलिए उसे उपेक्षा के जरिए मारने में कुछ भी अनुचित नहीं है। योगी आदित्यनाथ का उर्दू को मौलवी बनाने और कठमुल्लापन बढ़ाने का समानार्थी बना देना, ठीक इसी प्रयास का हिस्सा है।
स्वाभाविक रूप से नेता प्रतिपक्ष, माता प्रसाद पांडे ने मुख्यमंत्री के विस्फोट पर आपत्ति की। खबरों के अनुसार उन्होंने कहा कि, ‘मुख्यमंत्री ने कहा है कि उर्दू कठमुल्ला पैदा करती है। मैं इस शब्द पर आपत्ति करता हूं और पूछना चाहता हूं कि क्या उर्दू के बड़े शायर, फिराक गोरखपुरी भी कठमुल्ला थे या उर्दू का ज्ञान रखने वाले प्रख्यात उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद भी कठमुल्ला थे? या विश्वविद्यालय में जो उर्दू विभाग खोला गया है, वहां पढ़ने वाले भी कठमुल्ला हैं क्या?’ लेकिन, इन तर्कों का मुख्यमंत्री योगी पर कोई असर पड़ा नहीं लगता है। इसकी सीधी सी वजह यह है कि योगी का रुख किसी नासमझी या सचाइयों की नाजानकारी का नतीजा नहीं है। वह तो सोच-समझकर, अपनी नफरत की राजनीति के हिस्से के तौर पर अपनाया गया रुख है। इसीलिए, उन्हें उर्दू के नाम से सिर्फ मौलवी बनना और देश को कठमुल्ला बनाना दिखाई देता है। यह दूसरी बात है कि यह सबसे ज्यादा तो खुद योगी की शिक्षा पर ही लागू होता है, जबकि उनकी शिक्षा कम से कम उर्दू में तो नहीं ही हुई होगी।
संघ-भाजपा की सांप्रदायिक भाषायी राजनीति की जड़ में ही, बहिष्करण या एक्सक्लूजन है, जो भाषाओं के स्वाभाविक व्यवहार में निहित समावेशन के खिलाफ जाता है। इसीलिए, वे अंग्रेजी राज द्वारा खड़े किए गए हिंदी और उर्दू के एक झूठे द्वैध या बाइनरी के न सिर्फ योग्य उत्तराधिकारी बने रहे हैं बल्कि उन्होंने उसे और आगे बढ़ाया है, जहां हिंदी के हित के नाम पर, उर्दू का गला घोंटने की राजनीति की जाती है, जिसका सबूत आदित्यनाथ का रुख है। लेकिन, कथित राष्ट्रीय भाषा को छोड़कर अन्य भाषाओं और वास्तव में भाषा-संंस्कृतियों का इस तरह ‘पराया’ किया जाना, उर्दू के मामले में सांप्रदायिक आग्रहों के चलते सबसे उग्र भले हो, लेकिन उसी तक सीमित नहीं है। वास्तव में, कम या ज्यादा, हिंदी को छोड़कर सभी भारतीय भाषाओं के साथ, इस सांप्रदायिक भाषायी राजनीति का व्यवहार में यही सलूक है।
यह कोई संयोग ही नहीं है कि ठीक उसी समय, जब योगी आदित्यनाथ, उर्दू पर उसे कठमुल्लापन की भाषा करार देते हुए हमला बोल रहे थे, तभी मोदी सरकार के शिक्षा मंत्री, धर्मेंद्र प्रधान ने दक्षिण में तमिलनाडु की सरकार के खिलाफ, कथित राष्ट्रीय शिक्षा नीति और उससे जुड़े कई निर्णयों को थोपने के लिए, बाकायदा युद्घ छेड़ रखा था। इस युद्घ में केंद्र का मुख्य हथियार है, राज्य सरकार को बदनाम करने वाले प्रचार के अलावा, शिक्षा के लिए केंद्रीय फंड रोकने की उसकी धमकी। राज्य पर त्रिभाषा फार्मूला थोपा जाना, इस युद्घ के मुख्य लक्ष्यों में से एक है। हैरानी की बात नहीं है कि तमिलनाडु की सरकार और आम तौर पर दक्षिण भारत का बड़ा हिस्सा, आज की परिस्थितियों में इन भाषायी फार्मूलों को हिंदी थोपने की कोशिशों के तौर पर ही देखता है।
वे उचित ही यह सवाल भी उठाते हैं कि कथित त्रिभाषा फार्मूले में देश के विशाल हिंदी भाषी क्षेत्र में व्यवहार में क्या सचमुच कहीं भी हिंदी और अंग्रेजी के अलावा किसी तीसरी भाषा पर अमल हो रहा है। सभी जानते हैं कि किस तरह हिंदी-उर्दू भाषी क्षेत्र के बड़े हिस्से में, तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत के चयन के नाम पर, इसे व्यवहार में दो-भाषा फार्मूला बनाकर ही लागू किया जा रहा है। यहां संस्कृत का उपयोग, अन्य भारतीय भाषाओं की हकमारी करने के लिए शिखंडी के तौर पर किया जा रहा है, जबकि वास्तव में अगर किसी भारतीय भाषा को कठमुल्लापन की भाषा कहा जा सकता है, तो वह संस्कृत ही है।
इसके पीछे सांप्रदायिक राजनीति की वह बुनियादी कठमुल्लापन भरी समझ है, जो एकरूपता को राष्ट्रीय एकता के साधन के रूप में पेश करती है। लेकिन, सच्चाई इससे ठीक उल्टी है। हमारे जैसे धर्म, भाषा, संस्कृति की समृद्घ बहुलता वाले समाज में, एकरूपता थोपने की इस तरह की कोशिशें, राष्ट्रीय एकीकरण के बजाए बिखराव का ही साधन बनती हैं। मोदी राज में हम ठीक यही होता देख रहे हैं। हालांकि, रस्म-अदायगी के तौर पर वर्तमान निजाम को भी बार-बार बहुलता में विश्वास होने की कसमें खानी पड़ती हैं, लेकिन उसने एकरूपता थोपने की और केंद्रीयकरण की जिन प्रक्रियाओं को छेड़ दिया है, राष्ट्रीय एकीकरण के सूत्रों को छिन्न-भिन्न करने में ही लगी हुई हैं।
इसी के हिस्से के तौर पर भाषा की सांप्रदायिक राजनीति, एक वर्चस्वशाली भाषा के रूप में हिंदी को थोपने के जरिए, अन्य सभी भारतीय भाषाओं के साथ उसके रिश्तों में नफरत रोप रही है, जबकि भाषाओं के स्वाभाविक रिश्ते, परस्पर लेन-देन से, सभी को समृद्घ बनाने वाले रिश्ते होते हैं, न कि परस्पर द्वेष के रिश्ते। कर्नाटक और महाराष्ट्र की सीमा पर पड़ते बेलगाम के इलाके में, जहां लोग दोनों भाषाओं के मेल से मिली एक मिश्रित भाषा को बरतते आए हैं, कन्नड़ बनाम मराठी के टकराव की भाषायी राजनीति जो कर रही है, भाषाओं के रिश्तों में नफरतें रोपे जाने का ही नमूना है। इसका हिंदी की वर्चस्वशाली स्थिति कायम किए जाने से रिश्ता यह है कि हिंदी की इस हैसियत का दावा, भाषाओं के आपसी व्यवहार में इस वर्चस्ववादी मॉडल को ही स्थापित करता है।
अंत में हिंदी और उर्दू के रिश्ते की बात। मरहूम शायर *मुनव्वर राना* ने क्या खूब कहा है :
लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में गजल कहता हूं, हिंदी मुस्कुराती है।
उर्दू और हिंदी जुड़वां बहनें हैं। अब हम पर है कि दोनों बहनें साथ-साथ मुस्कुराती रहती हैं या एक को मारने के चक्कर में दोनों मार दी जाती हैं। आदित्यनाथ का रास्ता स्पष्ट है। और आपका रास्ता?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)