सियासत के पुराने जख्मों पर मरहम लगाने को ‘उक्रांद’ फिर मैदान में

देहरादून। पिछले लंबे समय से अपनी खोई हुई सियासी जमीन को तलाशने के लिए उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) एक बार फिर चुनाव के मैदान में उतरा है। लोकसभा-24 के चुनाव में यूकेडी ने चाल सीटों क्रमश: पौड़ी गढ़वाल, हरिद्वार, नैनीताल व अल्मोड़ा से अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। जबकि टिहरी लोकसभा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी बॉबी पंवार को समर्थन देने का एलान किया है। यद्यपि इस बार यूकेडी ने जिन चेहरों पर दांव खेला है वह ना ही अनुभवी व प्रखर राजनीतिज्ञ हैं और ना ही मजबूत जनाधार वाले, पर दल ने इन पर भरोसा जताया है। अब देखने वाली बात यह कि चुनाव मैदान में उतरे ये प्रत्याशी यूकेडी नेतृत्व के भरोसे पर कितना खरा उतरते हैं।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में एकमात्र क्षेत्रीय दल का तमगा उत्तराखंड क्रांति दल के नाम है। ढ़ाई दशक पहले पृथक राज्य के लिए हुए आंदोलन से ही उक्रांद का सियासी जन्म भी हुआ था। लेकिन मौजूदा दौर में स्थिति यह कि इस क्षेत्रीय दल के पास अपनी सियासी जमीन ही नहीं है। ऐसे में एक बार फिर लोकसभा चुनाव—24 का बिगुल फूंक जाने के बाद यूकेडी अपनी खोई हुई सियासी जमीन को तलाशने की जुगत में है। वैसे भी उक्रांद का शीर्ष नेतृत्व राज्य की पांच में से चार सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतार चुका है, जबकि एक सीट पर निर्दलीय को समर्थन दिया है। अब यह आने वाला वक्त बतायेगा कि इस बार के लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल सियासी मैदान में कितना दमखम दिखा पाता है। पर बीते लोकसभा, विधानसभा व निकाय चुनावों में जो उक्रांद का जो हस्र हुआ है वह कहीं न कहीं क्षेत्रीय दल के अस्तित्व पर सवाल तो उठाता ही है। इससे पहले वर्ष 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में भी उक्रांद ने अधिकांश विस सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। लेकिन परिणाम रहा सिफर। क्योंकि दल का कोई भी प्रत्याशी अपनी जमानत तक बचाने में सफल नहीं रहा था। इसके बाद हुए नगर निकाय चुनावों में भी यूकेडी को सियासी जमीन पर मुंह की खानी पड़ी थी। नगर निगमों व पालिकाओं में महापौर व पालिकाध्यक्ष तो दूर वार्डों में तक उक्रांद के प्रत्याशी अपनी जमानत नहीं बचा पाए थे।
वर्ष 2019 के लोकसभा सभा चुनाव में भी प्रदेश की सभी पांच संसदीय सीटों पर यूकेडी प्रत्याशियों की बुरी हार हुई थी। किसी भी प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बची थी। वहीं वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी यूकेडी कई सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। लेकिन परिणाम वही पुराने चुनाव वाले। सिर्फ दो प्रत्याशी ही एक हजार से अधिक वोट पा सके थे। जबकि अन्य प्रत्याशियों के खाते में वोट डेढ़-दो सौ या तीन सौ के लगभग ही आए। यूं कहा जा सकता है कि साल दर साल क्षेत्रीय दल यूकेडी का सियासी वजूद कमजोर ही होता गया। अब लोकसभा चुनाव में यूकेडी फिर अपनी खोई हुई सियासी जमीन को तलाशने के लिए उछल-कूद कर रही है। इतना जरूर कि इस बार दल की कमान नए केंद्रीय अध्यक्ष पूरण सिंह कठैत के हाथ में है। लेकिन उनकी टीम में वही पुराने सिपाही हैं जो बीते चुनावों में भी दमखम के साथ सियासी मैदान में उतरने का दावा करते रहते थे। बहरहाल, आगामी कुछ समय बाद होने वाले निकाय व पंचायत चुनाव से पहले लोकसभा का यह चुनाव यूकेडी के लिए बहुत कुछ सीखाने वाला तो है ही।

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