धर्मपाल धनखड़
कर्नाटक में चुनावी जंग रोचक दौर में पहुंच गयी है। तमाम पार्टियों के महारथी पूरी ताकत के साथ जुटे हुए हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्यों और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों व अन्य नेताओं की भारी-भरकम फौज के साथ प्रचार अभियान में दिन रात एक किये हुए हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान की बागडोर राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रियंका-गांधी वाड्रा संभाले हुए हैं। वहीं जेडीएस समेत कई विपक्षी पार्टियों के नेता भी सिर धड़ की बाजी लगाये हुए हैं। चुनाव प्रचार में जहरीले और विषैले शब्दों के प्रयोग से पूरा वातावरण ही विषाक्त सा हो गया है। चुनाव प्रचार में आम आदमी की समस्याएं, बेरोजगारी, गरीबी और भ्रष्टाचार के मुद्दे छाये हुए थे। जो सत्ताधारी पार्टी बीजेपी पर भारी पड़ रहे थे। लेकिन अचानक एक जनसभा में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जुबान फिसली गयी। वे प्रधानमंत्री मोदी को सांप की तरह जहरीला कहकर निशाने पर आ गये। हालांकि बाद में उन्होंने इस पर सफाई भी दी थी। लेकिन तीर छूट चुका था। उसे वापस लौटाना संभव नहीं। गालियों से गोटियों की तरह खेलने में माहिर बीजेपी के सुपर स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने मुद्दा लपक लिया। उन्होंने इसे लपेटते हुए कहा कि अब तक विरोधी नेता, उन्हें 91 गालियों दे चुके हैं। वे भी विपक्ष पर जहर बुझे तीरों से ताबड़तोड़ हमला कर रहे हैं। इस पर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने पलटवार करते हुए कहा कि उनके परिवार को तो इतनी गालियां दी गयी हैं कि उन पर किताब लिखी जा सकती है। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री विपक्ष की ओर से उन्हें दी जाने वाली गालियों का पूरा लेखा जोखा रखते हैं। कभी वे गालियों का वजन बताते हैं, तो कभी उनकी संख्या। लेकिन देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा! कि देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के नेता, एक राज्य के विधानसभा चुनाव में परस्पर गालियों का आदान-प्रदान करने के साथ उनकी गिनती, वजन और विशालता बताकर उनके प्रभाव का भी चित्रण कर रहे हैं। वहीं भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार स्तम्भ, बेचारा मतदाता अपनी बेबसी पर आंसू बहाते हुए भी इन गालियों को सुनकर तालियों की गड़गड़ाहट से आसमान को गुंजायमान कर देता है।
लोकतंत्र के इस तमाशे में पार्टियों के घोषणा-पत्रों की भी अहम भूमिका होती है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने अपने घोषणा पत्र, माफ कीजिएगा संकल्प पत्र में इस बार गरीबों के लिए मुफ्त के वादों की झड़ी लगा दी। इसमें बीपीएल परिवारों को हर महीने पांच किलो राशन देने, साल में रसोई गैस के तीन सिलेंडर मुफ्त देने का वादा किया है। एक सिलेंडर दक्षिण भारतीय नववर्ष के मौके पर तो दूसरा गणेश चतुर्थी और तीसरा दीपावली पर। अब सवाल ये उठता कि क्या देश में हिंदू ही गरीब हैं। क्या अन्य धर्मों के लोग गरीब नहीं हैं? क्या उनके त्योहार नहीं होते? क्या वे देश के दोयम दर्जे के नागरिक हैं। जाहिर है इसके पीछे सोची समझी रणनीति है। धार्मिक ध्रुवीकरण की और तुष्टिकरण की, जिसे मोदी जी संतुष्टिकरण कहते हैं। इसके अलावा दस लाख बेघरों को घर देने, महिला और एस सी एस टी परिवारों दस हजार रुपए की पांच साल की एफ डी करवायी जायेगी। तीन लाख महिलाओं को फ्री बस पास मिलेगा। मुफ्त भोजन के लिए अटल आहार केंद्र खुलेंगे और तीर्थ यात्रा के लिए गरीब परिवारों को साल में 25 हजार रुपये दिये जायेंगे। इसके अलावा हर बीपीएल परिवार को रोजाना आधा लीटर दूध की थैली मुफ्त दी जायेगी। वो भी नंदनी दूध की। चूंकि नंदनी बनाम अमूल बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है। अब हमारा प्रधानमंत्री जी से एक ही सवाल है कि आप मुफ्त रेवड़ियों का विरोध करते-करते खुद ही मुफ्त की रेवड़ियां क्यों बांटने लगे गये? इसके अलावा बीजेपी को कर्नाटक के गरीबों से इतना ही लगाव है तो राज्य और केंद्र में आपकी ही डबल इंजिन सरकार है। फिर अब तक ये सब क्यों नहीं ये सब किया गया? बड़ा सवाल ये भी है कि चुनाव के वक्त ही गरीबों की सुध क्यों आती है राजनीतिक दलों को? मुफ्त की घोषणाओं में कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। दो सौ यूनिट बिजली फ्री और महिलाओं को फ्री बस यात्रा का वादा मुख्य है। अब सवाल यही है कि चुनाव में फ्री का वादा करने वाले दल हर हाथ को काम देने के लिए रोजगार सर्जन पर जोर क्यों नहीं दे रहे? गरीब तबकों को मुफ्तखोर बनाने की बजाय, उन्हें सक्षम बनाने की कोई ठोस योजना किसी राजनीतिक दल के पास क्यों नहीं है? दरअसल सच तो ये है कि देश में योजनाबद्ध तरीके से गरीबों को अति गरीब बनाने की प्रक्रिया बरसों से चल रही है। चूंकि गरीबी राजनीतिकों और पूंजीपतियों के लिए कमाई का जरिया हैं। चुनाव में उसे सस्ते में खरीदा था सकता है। फ्री की घोषणाओं से लुभाया जा सकता है। यदि सब लोग सक्षम होंगे तो सस्ता श्रम नहीं मिलेगा। शिक्षित और सक्षम नागरिक अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे। वे अपना हक मांगेंगे। इसलिए बड़ी आबादी को अनपढ़ और निठल्ला बनाये रखना ही सत्ता का अघोषित मकसद है। वरना कोई कारण नहीं कि आजादी के 75 साल बाद भी बहुसंख्यक आबादी को शिक्षा, चिकित्सा जैसी मौलिक सुविधाएं नहीं दे पायें। रोजगार के मौके नहीं दे पायें। महज अमृतकाल की घोषणा करने से ही सब ओर आनंद की वर्षा नहीं होने लगेगी महाप्रभू। इसके लिए काम करना पड़ेगा। समाज के आखिरी पायदान पर खड़े आदमी को सक्षम बनाने के साथ उनके लिए जीवन जीने की न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करवानी होंगी। लेकिन ये सब कौन करना चाहेगा? चुनाव के समय गरीबों के लिए की जाने वाली घोषणाओं से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में कितनी गरीबी हैं? और क्यों इसको स्थाई रूप से बनाये रखा गया है?
कांग्रेस ने घोषणापत्र में एक वादा ये भी किया है कि समाज में नफ़रत फ़ैलाने वाले संगठनों को बैन किया जायेगा। इतने तक तो सब ठीक था। लेकिन घोषणापत्र में पीएफआई और बजरंग दल का नाम लेने के बाद ना केवल कर्नाटक, बल्कि पूरे देश में इसका विरोध शुरू हो गया। बजरंग दल को बैन करने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधे हनुमान से जोड़कर इसे चुनाव प्रचार का मुख्य जुमला बना दिया। हालांकि नफरत फैलाने वाले संगठनों को स्वाभाविक रूप से बैन किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी इसको लेकर कई बार चिंता जाहिर कर चुका है। लेकिन सत्ताधारी दल, यानी सरकारें अपने पराये में भेद करती हैं और चुनावी लाभ हानि का हिसाब देखती हैं। कहने का तात्पर्य ये हैं कि कांग्रेस ने बैठे बिठाए एक भावनात्मक मुद्दा बीजेपी को थमा दिया है। खबरिया चैनलों ने इसको लेकर तुरत-फुरत सर्वे करवाकर लाभ हानि का आंकड़ा भी दे दिया है। अब तक फ्रंट पर खेल रही कांग्रेस, बैकफुट पर आ गयी।
चुनाव में अवैध धन का कितनी बड़ी मात्रा में इस्तेमाल हो रहा है। इसका अंदाजा राज्य में आचार संहिता लागू होने के बाद पकड़ी गयी नकदी, आभूषण, कीमती गिफ्ट और शराब से सहजता से लगाया जा सकता है।