चीन को मना नहीं पाया भारत, कैलास मानसरोवर यात्रा न होने से निराशा की स्थिति

अब कोविड का खौफ भी नहीं,  आर्थिक गतिविधियों पर भी असर

हल्द्वानी। कोरोना की धीमी रफ्तार के बीच चारधाम यात्रा समेत देश भर की कई यात्राएं खुल गई हैं। इसके वाबजूद अभी तक विश्व विख्यात कैलास मानसरोवर यात्रा को लेकर केंद्रीय विदेश मत्रांलय खामोश है।

कैलास मानसरोवर यात्रा की इस साल भी क्षीण संभावनाओं के कारण कैलास जाने वाले यात्रियों के साथ ही यात्रा पथ से जुड़े हजारों लोगों में निराशा का भाव है। लगातार तीसरी बार कैलास यात्रा न होने से कुमंविनि के पास भी काम का अकाल पड़ने जा रहा है।

राजनीतिक दबाव के बीच आदि कैलास यात्रा को कुमंविनि किसी एंजेसी को दे रहा है। यह कैलास मानसरोवर यात्रा न होने से ज्यादा चिंता का विषय बन रहा है।

गौरतलब है कि नब्बे के दशक के बाद चीन से राजनीतिक और कूटनीतिक संबंधों के बिगडऩे और बनने के बीच पहली बार 2२0 में कोरोना ने कैलास मानसरोवर की यात्रा पर विराम लगाया। 1918 में मालपा की त्रासदी के वाबजूद कभी भी कैलास यात्रा में ठहराव नहीं आया।

यह यात्रा धार्मिक ही नहीं तिब्बत की सरहद को जोड़ने वाली सीमाओं को देखने और दारमा चौदांस घाटी के पलायन के वेग की तस्वीर को भी पेश करती है। यात्रा के कारण हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। इसमें पोटर से लेकर तमाम तरह के लोग जुड़े हुए हैं।

यही नहीं तिब्बत सीमा में जगह जगह चौकसी में तैनात आईटीवीपी के जवान भी इस यात्रा का खुले दिल से स्वागत करते हैं। उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार के कई प्रयास के वाबजूद चीन ने इस बार भी कैलास मानसरोवर यात्रा की अनुमति नहीं दी है।

इस कारण पश्चिम बंगाल से लेकर उत्तराखंड तक के लोगों को भारी निराशा मिली है। कैलास मानसरोवर यात्रा पर केंद्र सरकार की चुप्पी भी लोगों की निराशा को ज्यादा बढ़ा रही है।

चारधाम यात्रा को लेकर पूरी प्रशासनिक मशीनरी काम कर रही है, जबकि उत्तराखंड में धारचूला से शुरू होने वाली इस यात्रा को लेकर सरकार के स्तर से एक बयान तक नहीं आया है।

आम तौर पर यह यात्रा पहली जून से शुरू होती है। यात्रा की तैयारी के लिए फरवरी से प्रशासनिक अमला काम करने लग जाता है। इस यात्रा से कुमंविनि की अवस्थापना विकास से लेकर कई तरह के हित जुड़े हुए हैं।

यात्रा की बजह से काठगोदाम, अल्मोड़ा, दन्या, पिथौरागढ़, धारचूला, पांगू से लेकर लिपुलेख तक यात्री विश्रामालयों की दशा ठीक होने लगती है। पिछले तीन साल से यात्रा शुरू न होने के कारण कुमंविनि के टीआरसी की स्थिति में भी सुधार नहीं हो रहा है।

इस बीच राज्य सरकार और कुमंविनि ने रणनीतिक तौर पर आदि कैलास यात्रा को निजी हाथों में देने का फैसला कर कई नए सवाल पैदा कर दिए हैं। इस मामले में पूर्व सीएम हरीश रावत की सोशल मीडिया में दी गई प्रतिक्रिया से स्थिति को समझा जा सकता है।

रावत कहते हैं कि ह्य एक बहुत चिंताजनक समाचार पढ$ने को मिला। राज्य सरकार, ओम पर्वत, कैलास और उस क्षेत्र की यात्राओं को प्राइवेट लोगों को सौंपने जा रही है। कुमंविनि से उसका संचालन लेकर प्राइवेट लोगों को दिया जाएगा। इसका सीधा अर्थ है कि को बंद करना।

उन्होंने सवाल किया है कि पिथौरागढ़ से होकर जाने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा को संचालित करने का अधिकार कुमंविनि के पास नहीं रहेगा तो उसके पास क्या रहेगा रावत ने यहां केवल कुमंविनि की स्थिति पर प्रतिक्रिया की है। जबकि इस पूरे मामले को समग्र और सामरिक तौर पर नजरिए से देखने की भी जरुरत है।

इस मामले में नैनीताल सांसद एवं कें द्रीय रक्षा एवं पर्यटन राज्य मंत्री अजय भट्ट से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन दिन भर बैठक में व्यस्त होने के कारण उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

इस कारण केंद्र सरकार का पक्ष नहीं मिल पाया। जबकि राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकार को चारधाम यात्रा की तरह से ही कैलास मानसरोवर यात्रा शुरू करनी चाहिए थी।

उन्होंने कहा कि चूंकि इस समय कैलास मानरोवर यात्रा मार्ग में कोविड का फैलाव नहीं है। भारत में भी स्थिति ठीक है। ऐसे अवसर पर केंद्र सरकार को चीन से कूटनीतिक तौर पर यात्रा शुरू करानी चाहिए थी।

उन्होंने कहा कि लगातार तीस साल यात्रा बंद रखनी चिंताजनक है। इससे महादेव के दर्शन करने से सैकड़ों लोग वचिंत हो रहे हैं। इस पर सरकार की ओर से कोई जानकारी भी साझा नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि यात्रा बंद रहने के आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।

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