राकेश परिवार तक सिमटती रही भगवानपुर की सियासत

रुडक़ी। हरिद्वार जिले की भगवानपुर विधानसभा एक ऐसी सीट है जिसपर साल 2002 के चुनाव को यदि छोड़ दे तो एक ही परिवार का लगातार कब्जा होता आ रहा है।चुनावी सिम्बल भले ही बदलता रहा हो लेकिन जीत राकेश परिवार के ही हिस्से में आई है।जिसके चलते भगवानपुर की सियासत राकेश परिवार की चौखट से बाहर नहीं निकली है।

अब जबकि एक बार फिर चुनावी बिगुल बज चुका है तो सियासतदां की निगाहें एक बार फिर इसी परिवार पर लग गयी है। हालांकि 2015 के बाद परिवार में बिखराव हो गया था जिस कारण देवर भाभी के अलग अलग सियासी दल हो गए।
उत्तराखंड के वजूद में आने से पहले भगवानपुर रुडक़ी विधानसभा का हिस्सा हुआ करता था।

लेकिन तभी से भगवानपुर की सियासत राकेश परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही थी। इस परिवार ने ब्लॉक के राजनीति से सफर शुरू किया था। जो उत्तराखंड बनने के बाद भी जारी है। बताया गया है उत्तराखंड के वजूद में आने के बाद भगवानपुर को विधानसभा सीट बनाई गई। साल 2002 में पहला चुनाव हुआ।

जिसमें राकेश परिवार की विरासत को संभालते हुए सुरेंद्र राकेश ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। लेकिन इस चुनाव में उन्हें भाजपा के चंद्रशेखर प्रधान से हार का सामना करना पड़ा। लेकिन उसके बाद से भगवानपुर विधानसभा सीट पर राकेश परिवार का कब्जा लगातार चला आ रहा है।

साल 2007 में फिर से विधानसभा चुनाव हुआ। इसमें सुरेंद्र राकेश ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद साल 2012 में सुरेंद्र राकेश ने फिर से बसपा के सिंबल पर चुनाव लड़ा और लगातार दूसरी बार जीत हासिल करने के साथ ही उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री बन गए।

लेकिन इसी बीच उनकी तबीयत खराब हो गई और 7 फरवरी 2015 को कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र राकेश का निधन हो गया। उनकी मौत के बाद 2015 में भगवानपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव का बिगुल बजा। बताया गया है कि दिवंगत मंत्री की विरासत को संभालने के लिए उनकी पत्नी ममता राकेश व भाई सुबोध राकेश में रार पैदा हो गई।

लेकिन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत ने दिवंगत मंत्री की सहानुभूति बटोरने के लिए उनकी पत्नी ममता राकेश को कांग्रेस का टिकट थमा दिया और ममता राकेश ने जीत हासिल की। लेकिन इसके बाद सुबोध राकेश व ममता राकेश का सियासी घराना अलग अलग हो गया।

ममता राकेश जहां कांग्रेस में रही वही सुबोध राकेश ने भाजपा का दामन थाम लिया। साल 2017 में फिर से विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा। इस चुनाव में ममता राकेश कांग्रेस और उनके देवर सुबोध राकेश भाजपा टिकट पर चुनाव लड़े। लेकिन ममता राकेश ने जीत हासिल कर अपने देवर को कड़े मुकाबले में हराया।

इसके बाद निकाय चुनाव हुए जिसमें सुबोध राकेश अपनी माता को भगवानपुर नगर पंचायत अध्यक्ष बनवाने में कामयाब हो गए। लेकिन भाभी देवर की सियासी रार लगातार जारी रही। अब जबकि साल 2022 का चुनावी बिगुल बज चुका है।

सुबोध राकेश भाजपा को अलविदा कहकर बसपा का दामन थाम चुके हैं और उनका बसपा सिंबल पर चुनाव लडऩा भी तय माना जा रहा है। जबकि कांग्रेस से ममता राकेश का लडऩा तय है। ऐसे में एक बार फिर भगवानपुर की सियासत राकेश परिवार तक सिमटती नजर आ रही है।देखने वाली बात ये होगी कि इस चुनाव में भगवानपुर की सियायत राकेश परिवार से बाहर निकलती है या फिर इसी परिवार का दबदबा बरकरार रहता है।

खानपुर सीट पर एक दशक से गुर्जर बिरादरी का दबदबा

खानपुर विधानसभा सीट पर एक दशक से गुर्जर बिरादरी का कब्जा रहा है। मुस्लिम मतों की एकजुटता व दलित वोटों के बिखराव का लाभ गुर्जर बिरादरी के प्रत्याशी को मिलता रहा है। पिछले दस सालों से खानपुर सीट पर गुर्जर बिरादरी के कुंवर प्रणव सिंह कांग्रेस व टिकट पर चुनाव जीतते आ रहे है।इससे पहले कुंवर प्रणव सिंह लक्सर सीट से भी दो बार जीत हासिल कर चुके है।
खानपुर विधानसभा सीट के वोटों की बात करें तो गुर्जर बिरादरी की इस सीट पर करीब 17 हजार वोटर हैं। सबसे ज्यादा करीब 48 हजार वोट मुस्लिम हैं। अनुसूचित 25 हजार, पर्वतीय मूल के वोटरों की संख्या करीब 14 हजार है जबकि 4 हजार कुम्हार, सैनी 10 हजार, सिख 3 हजार,कश्यप 4 हजार, कुम्हार 4 हजार, ठाकुर 2 हजार, बनिया 3 हजार, गड़रिया 4 हजार व करीब 9 हजार वोट अन्य बिरादरियों के है। बावजूद इसके गुर्जर समाज से ही इस सीट का पहचान बनी है।

मुस्लिम मतों का कभी बिखराव तो कभी एकजुटता के चलते गुर्जर प्रत्याशी प्रणव सिंह की विधानसभा पहुंचने की राह आसान होती रही है।दलित वोटों का बिखराव व अन्य जातियों की एक जुटता का लाभ भी मिलता रहा है।खानपुर क्षेत्र में विकास को लेकर बहुत कुछ करना बाकी है।

यहां के प्रमुख मुद्दों में शिक्षा, रोजगार के उचित साधन न होना, स्वास्थ्य, परिवहन, खेल, मनोरंजन व साहित्य का अभाव, ग्रामीण क्षेत्रों में सडक़ व जलभराव की समस्या आम है। मुस्लिम क्षेत्रों की उपेक्षा के आरोपों के साथ ही रोडवेज डिपो की स्थापना व संचालन की मांग लंबे समय से चल रही है।

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