सरकार के वोट बैंक को खिसकाने की तैयारी!

किसान आन्दोलन

वीरेंद्र सेंगर
नई दिल्ली। चार महीने तक धीमी गति से चलने वाले किसान आंदोलन ने एक बार फिर नई अंगड़ाई ली है।
इस बार आंदोलन नई आक्रामक रणनीति से लैस हो गया है। दिल्ली बॉर्डर पर जमे आंदोलन को चलते 6
महीने पूरे हो चुके हैं। पिछले साल 26 नवंबर से यह जुझारू आंदोलन शुरू हुआ था। 26 मई को इसको 6
महीने पूरे हुए हैं। इस अवसर पर आंदोलनकारी किसानों ने सरकार के खिलाफ देशव्यापी काला दिवस
मनाया। जगह-जगह काले झंडे लगाकर, प्रधानमंत्री मोदी के पुतलों का दहन किया गया। सुरक्षाबलों के
तमाम दबाव के बावजूद किसानों ने अपनी जांबाजी का परचम लहराया।
  • मांगों को लेकर छह माह बाद भी किसान झुकने को तैयार नहीं
  • तमाम षड्यंत्र के बावजूद खट्टर एंड कंपनी किसानों को तोड़ नहीं सकी 

 मोदी सरकार की तमाम हठधर्मिता के बावजूद किसान आक्रामक मुद्रा में बने हुए हैं। उनका संकल्प है कि जब तक सरकार तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस नहीं लेती, तब तक आंदोलनकारी घर वापसी नहीं करेंगे। इसी के साथ वे अपनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी की कानूनी गारंटी का प्रावधान चाहते हैं। साफ है कि वे इसके लिए एक नया कानून चाहते हैं। जिससे पूरे देश के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मिल जाए। इन्हीं मांगों के साथ हाहाकारी आंदोलन की शुरुआत पिछले साल हुई थी।
इसकी शुरुआत ही सरकार के साथ भारी टकराव से हुई थी। भाजपा नेतृत्व की पूरी कोशिश रही कि आंदोलन को ताकत के बल पर कुचल दिया जाए। जब 25-26 नवंबर, 2020 को आंदोलनकारी किसान पंजाब से दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे तो हरियाणा की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने जमकर सत्ता का दुरुपयोग किया। किसानों के ट्रैक्टर तोड़े गए। आंसू गैस के गोले दागे गए। इस पर भी जब किसान आगे बढ़ते रहे तो मुख्य सड़कों में गहरे गड्ढे खोद दिए गए। लाठीचार्ज हुआ। इसके बाद भी किसानों ने बहादुरी से तमाम बाधाएं पार कर लीं। क्योंकि इन्हें हरियाणा के किसानों का भी साथ मिल गया।
हरियाणा की मनोहर मनोहर लाल खट्टर सरकार ने अपने दिल्ली के आकाओं के इशारे पर तमाम षड्यंत्र कर डालें, ताकि हरियाणा की भागीदारी इसमें ना हो पाए। लेकिन खट्टर एंड कंपनी इसमें कामयाब नहीं हुई। यह बात अलग है कि दिल्ली पुलिस ने किसानों को सीमाओं पर ही रोक लिया। जबकि आंदोलनकारी अपना डेरा दिल्ली के रामलीला मैदान में डालना चाहते थे। अंततः किसानों ने सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर व गाजीपुर बॉर्डर पर अपने लंगर डाल दिए। इसी क्रम में पलवल सहित कई और स्थानों पर धरने शुरू हो गए। बड़ी संख्या में जब पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान जमा हो गए तो केंद्र सरकार को मजबूरी में बातचीत के लिए मेज पर आना पड़ा। 11 बार सरकार ने दिल्ली के विज्ञान भवन में बड़े तामझाम के साथ किसान नेताओं से बातचीत की।
हर दौर में सरकार ने नए पैंतरे अपनाए। लेकिन आंदोलन के नेताओं ने भी कड़े तेवर अपना लिये। वे मुख्य मांगों पर मजबूती के साथ डटे रहे। इस बीच उच्चतम न्यायालय से भी हस्तक्षेप करवाने की नापाक कोशिश की गई। लेकिन बात नहीं बनी। दबाव में सरकार ने कानूनों के कुछ विवादित प्रावधानों पर संशोधन करने की बात मान भी ली, लेकिन यह सहमति महज कागजी रही। आज तक सरकार ने संशोधनों पर अपनी कानूनी मुहर नहीं लगाई। न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर सरकार कुछ मुलायम तो दिखी, लेकिन इस पर उसने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया। इससे बात नहीं बनी। आखिरी बातचीत 22 जनवरी को हुई थी। इसके बाद आज तक संवाद का दौर रुका हुआ है। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसानों ने भी दिल्ली में गणतंत्र दिवस मनाने का ऐलान किया। तमाम जद्दोजहद के बाद दिल्ली पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच सीमित रास्तों पर जाने की सहमति बनी। फिर सरकार ने अपने गुर्गों से ‘लाल किले का कांड’ कराया। यह सब इतिहास है। लेकिन सरकार ने इसके जरिए आंदोलन को तोड़ने की पूरी कोशिश की। कुछ झटका भी आंदोलन को लगा। लेकिन आंदोलन जल्दी ही नई ताकत के साथ मजबूत हो गया था।

इसके बाद केंद्र सरकार और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व प .बंगाल की चुनावी तैयारियों में जुट गया। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ‘बंगाल मिशन’ में रम गये। इसके पहले ये लोग बिहार के चुनावी मिशन में जुटे रहे थे। यहां तो किसी तरह साधारण बहुमत से भाजपा और जनता दल (यू) की साझा सरकार बन गई।
सरकार और भाजपा की सियासी प्राथमिकता में किसान आंदोलन और कोरोना के दूसरे दौर की शुरुआत नहीं रहे। शायद सरकार की कोशिश किसानों को थकाकर हटाने की रही। लेकिन आंदोलनकारियों के हौसले कमजोर नहीं पड़े। इस बीच आंदोलन देशव्यापी होता रहा। फिर भी सरकार ने कोई तवज्जो नहीं दी। आंदोलन को तोड़ने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जाते रहे। यह अलग बात है कि इन साजिशों से किसानों का गुस्सा और बढ़ता रहा।
वे सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसान महापंचायत करने लगे। इनमें राजस्थान, हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में किसानों की भागीदारी होती रही। कई ऐसी किसान पंचायतों में लाख, दो लाख यहां तक कि तीन लाख किसानों की भागीदारी की खबरें और तस्वीरें आती रही। देशव्यापी आंदोलन बनाने के लिए आंदोलनकारी नेतृत्व ने महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और उड़ीसा के दौरे कर डाले। इस मुहिम को भारी सफलता भी मिलती गई।
जब प. बंगाल का चुनावी प्रचार परिदृश्य गरम हुआ तो आंदोलनकारियों ने अपनी हिचक तोड़कर, भाजपा के खिलाफ सीधे मोर्चाबंदी की शुरुआत कर दी। वहां जाकर किसान नेताओं ने चुनावी रैलियां की। खास तौर पर किसानों और मजदूरों से अपील की कि वे इस चुनाव में भाजपा के खिलाफ वोट करें, ताकि मोदी एंड कंपनी का सियासी अहंकार कुछ हो। 22 मई को चुनाव परिणाम आया तो भाजपा को भारी झटका लगा। तमाम मोर्चाबंदी और अरबों रुपए के खर्च के बाद भी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी दो तिहाई बहुमत से अपनी सत्ता बचाने में सफल रही। इस तरह मोदी एंड कंपनी को सियासी तौर पर भारी झटका लगा।
उल्लेखनीय है कि अप्रैल की शुरुआत से ही कोरोना की दूसरी लहर ने देशभर में मार शुरू कर दी थी। लेकिन प्रधानमंत्री सहित लगभग पूरी कैबिनेट बंगाल मुहिम में लगी रही। इधर, पूरे देश में ऑक्सीजन अस्पताल व दवाओं की किल्लत से हाहाकार मच गया। हजारों लोग तड़प तड़प कर मर गए। लेकिन सरकार की प्राथमिकता पश्चिमी बंगाल जीतने की रही। चुनाव परिणाम आने के बाद देश में लाॅकडाउन की कवायद शुरू हुई जो कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी रही। इस बार करोना ने मौत का तांडव किया। श्मशान घाटों पर लाइन लगी रही। हजारों गरीब परिवारों ने यूं ही नदियों में मृतकों को बहा दिया। जिससे गंगा जैसी पवित्र मानी जाने वाली नदियां प्रदूषित हुई। इससे सरकार की पोल खुली कि सरकार मौतों का आंकड़ा छुपा रही है।
सरकार को इस मोर्चे पर भारी विफलता मिली है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बहुत बदनामी हुई। सरकार ने कोरोना से मौत का आंकड़ा करीब सवा तीन लाख बताया है। जबकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने यह आंकड़ा 6 लाख से 24 लाख तक माना है। इतना ही नहीं, भारत के ही मीडिया ने तथ्य रखे हैं कि सरकार ने हर स्तर पर आंकड़े छुपाए हैं। इससे पूरी दुनिया में सरकार की थू-थू हो रही है।
किसान आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार की कोरोना को हथियार बनाने की कोशिश जारी है। भाजपा के आईटी सेल ने आंदोलन को बदनाम करने के लिए भी अफवाह जोर शोर से फैलाई कि आंदोलन के चलते हजारों गांवों में कोरोना फैला है। किसान आंदोलन के एक प्रमुख चेहरा डॉ सुनीलम का मानना है, ‘भाजपा के लोग घोर अफवाहबाज हैं। संघ की इसमें उस्तादी है। यह तथ्य दुनिया जानती है कि जब कोरोना की भयंकर लहर थी, तब प्रधानमंत्री मोदी सहित पूरी सरकार प. बंगाल में चुनावी मिशन में जुटी थी। मोदी जी, रैलियों में लाखों लोगों को जुटाकर गदगद हो रहे थे। इन रैलियों के वीडियो इसके जीते जागते प्रमाण हैं।’
डॉ. सुनीलम ने इस आंदोलन को व्यापक बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। उनकी खास कोशिशों से विपक्ष की सभी प्रमुख पार्टियों ने 26 मई को देशव्यापी काले दिवस के रूप में अपना समर्थन दिया है। इस तरह से यह आंदोलन मोदी सरकार के खिलाफ सियासी एकजुटता की धुरी भी बनता जा रहा है। कुछ महीनों बाद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। यूपी का चुनाव केवल यूपी की सत्ता के लिए ही नहीं, बल्कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सेमीफाइनल माना जा रहा है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने यूपी की सत्ता बचाने के लिए सियासी कवायद तेज कर दी है। जबकि किसान आंदोलन ने हुंकार भर दी है। यही कि पश्चिमी बंगाल की तरह यूपी और उत्तराखंड में भाजपा की हार के लिए जुटेंगे। यहां किसान आंदोलन की भूमिका बहुत असरकारी हो सकती है। यह बात संघ परिवार भी जानता है। ऐसे में आंदोलन को तोड़ने के लिए कोई और बड़ी साजिश हो सकती है। डॉ सुनीलम इसे चुनौती मानते हैं।
किसान नेता योगेंद्र यादव का मानना है, ‘केंद्र सरकार बौखला कर दमनकारी नीतियां और तेज कर सकती है। इसके मुकाबले के लिए आंदोलन तैयार है। दरअसल, अब यह आंदोलन कृषि कानूनों में बदलाव तक सीमित नहीं रहा। यह व्यापक जनांदोलन बन गया है। यह लोकतंत्र बचाने की मुहिम बन गई है। इसी से समूचे विपक्ष ने हमें समर्थन दिया है। जिस तरह देश तानाशाही की तरफ से बढ़ रहा है ऐसे में राजनीतिक ताकतों का खुला साथ लेने में भी हमें परहेज नहीं होगा। क्योंकि देश की लोकशाही खतरे में है। आंदोलन ने श्रमिकों के खिलाफ शोषणकारी कानून यानी श्रमिक कोड को वापस लेने की मांग भी जोड़ दी है। तमाम प्रमुख श्रमिक संगठन हमारे साथ कदमताल कर रही हैं।’ दावा किया है कि पिछले 6 महीनों में 475 किसान धरना स्थल पर शहीद हुए हैं।
डॉ. सुनीलम ने कहा कि संघ से जुड़ा किसान संघ भी अब असली रूप में सामने आ गया है। पहले यह एमएसपी का गारंटी कानून लाने का समर्थन और नए कृषि कानूनों का विरोध करता था। अब जब उसे लगा कि किसान आंदोलन भाजपा के वोट बैंक पर सीधा प्रहार कर रहा है, तो उसने पैंतरा बदल लिया है। अब वह बेशर्मी से केंद्र के पक्ष में खड़ा हो गया है। यहां तक कि हम किसान आंदोलनकारियों को आतंकी और टुकड़े टुकड़े गैंग का हिस्सा बता रहा है। इससे संघी किसान संगठन का असली चेहरा भी सामने आ गया है। डॉ सुनीलम को उम्मीद है, ‘हमारा आंदोलन नौकरशाही की रक्षा करेगा और मोदी के अहंकार को चकनाचूर कर के दिखा देगा।’

Leave A Reply

Your email address will not be published.