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राजनीतिक व्यंग्य हिंदी

क्या सच में बिक रहा है देश? पढ़िए राजनीति पर यह तीखा व्यंग्य

संपादकीय | व्यंग्य आज के दौर की राजनीति पर कटाक्ष करते हुए यह व्यंग्यात्मक लेख एक गंभीर सवाल खड़ा करता है—क्या विकास के नाम पर देश की संपत्तियां बेची जा रही हैं? लेखक ने व्यंग्य के माध्यम से उस मानसिकता को उजागर करने की कोशिश की है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक संपत्तियों को महज ‘बेचने…
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चुनाव में देवता, जीत के बाद पत्थर — नेताओं पर करारा व्यंग्य पढ़िए ‘पत्थर के सनम’

Krishna Gopal Vidyarth  भारतीय राजनीति में चुनावी मौसम आते ही नेताओं का स्वभाव मानो बदल जाता है। चुनाव से पहले वही नेता जनता के बीच विनम्र, सहानुभूतिपूर्ण और सेवा भाव से भरे नजर आते हैं, लेकिन चुनाव जीतते ही उनका व्यवहार अचानक कठोर और दूरस्थ हो जाता है। यही विरोधाभास इस व्यंग्य ‘पत्थर के सनम’ का…
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