भारत का चिंतन, भारत में प्राचीन समय से आध्यात्मिकता पर आधारित जीवन,एकात्म और समग्र दृष्टिकोण को समाहित करते हुए सतत प्रगति के मार्ग पर संघर्षों मे विजय प्राप्त करते हुए नवनिर्माण की प्रगति पर अग्रसर है इस पथ पर 20वीं शताब्दी के वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक ने अपने चिंतन से विश्व के विशालतम संगठन के रूप में आज 100 वर्षों के रूप में स्थापित कर दिया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतन में स्वर्णिम भविष्य की अपेक्षाएं अखंड भारत का स्वप्न,सेवा का अथक संकल्प,विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र के निर्माण में, स्वदेशी के चिंतन को, व्यक्ति निर्माण,और समरसता के मूल भाव को आगे बढ़ते हुए 2025 तक पहुंच गया है वर्तमान सर संघ चालक आदरणीय मोहन भागवत जी के 2018 के उद्बोधन से संघ की कार्य पद्धति को समझा जा सकता है “संघ का तरीका अनोखा होने के कारण संघ के कार्यकर्ता अपना काम करते रहते हैं वे प्रचार प्रसिद्धि के पीछे नहीं भागते हैं, संघ की शक्ति जैसे-जैसे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उनका प्रचार अपने आप होने लगता है” इस चिंतन का मूल संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार के बाल्यावस्था के जीवन से देखा जा सकता है विक्टोरिया रानी के राजा रोहन विक्टोरिया रानी के राज्यारोहण समारोह की जुबली भारत में मनाई गई थी हेडगेवार जी के स्कूल में भी मिठाई वितरण कार्यक्रम हुआ उन्होंने मिठाई को मिठाई वितरण कार्यक्रम से मिठाई लेना स्वीकार नहीं किया और उत्तर दिया कि हमारा राज्य छीनकर हमको गुलाम बनाने वालों की मिठाई हमारे लिए मिठाई कैसे हो सकती है और मूलत यह स्व का चिंतन था, जिसने आजादी के संघर्ष को भी बढ़ाया और वर्तमान समय में भी स्वदेशी,स्वाधीनता, स्वराज जैसे विषयों का महत्व आज समाज के सामने भारतीयता के गौरव के प्रतीक के रूप में आ गया है।
शिक्षा के चिंतन पर संघ के विचार सरसंघचालक जी के उद्बोधन में धर्मपाल जी का उल्लेख मिलता है जिन्होंने अंग्रेजों के आने के बाद जब सर्वे किया तो उनके ध्यान में आया की परंपरा में हमारी शिक्षा प्रणाली ज्यादा प्रभावी अधिक लोगों को साक्षर बनाने वाली मनुष्य बनने वाली और अपना जीवन चलने के लिए योग्य बनाने वाली थी पंतु वर्तमान परिवेश में आधुनिक शिक्षा प्रणाली वास्तविकता के रूप में है अतः जो उसमें लेने लायक हो वह लेते हुए अपनी परंपरा से जो लेना है वह लेकर हमें शिक्षा नीति पर कार्य करने की आवश्यकता है इसी को आधार बनाते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत भी है और वर्तमान समय की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक भी प्रतीत हो रही है इस सबके लिए महत्वपूर्ण है शिक्षा देने वालों का स्तर बढे और लेने वालों का स्तर भी बड़े क्योंकि यह सजग तालमेल ही भारत को विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा
उपनिवेशवाद के काल में अंग्रेजों द्वारा किए गए अथक शोषण कुशाशन और आजादी के संघर्ष में विभाजन की घोषणा जैसी कठिन परिस्थितियों में जनमानस के सहयोगी के रूप में, संघ ने सतत भागीदारी की है, साथ ही साथ अलगाववाद और उग्रवाद के क्षेत्र में आपदा के अवसर में कार्यकर्ताओं ने अपनी उपस्थिति भारत भूमि हर कोने कोने में दर्ज की है 100 वर्षों के इस अवसर पर आगामी वर्षों की चुनौतियों को भी पहचान है जिसके लिए कार्यकर्ता सतत कार्यरत भी है और तैयारी भी कर रहे हैं
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का चिंतन और सामूहिक कर्मयोगी की भूमिका निश्चित ही अतुलनीय है और किसी भी राष्ट्र के लिए यह वरदान है कि इस तरह की सोच के व्यक्ति सतत कार्यरत है और यही कारण है भारत, वैश्विक पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
डॉ रवि शरण दीक्षित
एसोसिएट प्रोफेसर
डी ए वी पीजी कॉलेज
देहरादून, उत्तराखंड