देहरादून। उत्तराखंड में बहु-मतदाता सूची विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। नैनीताल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव द्वारा 6 जुलाई 2025 को जारी आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है। इस आदेश के तहत जिलाधिकारियों को निर्देशित किया गया था कि यदि किसी उम्मीदवार का नाम एक से अधिक ग्राम पंचायत या नगर निकाय की मतदाता सूची में दर्ज है, तो उसका नामांकन रद्द न किया जाए।
राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी उत्तराखंड कांग्रेस ने इस आदेश को लेकर गंभीर आपत्ति जताई थी। पार्टी की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने इसे संविधान, पंचायती राज अधिनियम और जन प्रतिनिधित्व कानून के खिलाफ बताते हुए कोर्ट में चुनौती दी थी।
क्या है विवाद का मूल कारण?
राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव ने 6 जुलाई को जारी एक आदेश में कहा था कि ऐसे उम्मीदवार जिनका नाम एक से अधिक मतदाता सूचियों में दर्ज है, उनका नामांकन रद्द न किया जाए। इस आदेश को लागू करने की जिम्मेदारी जिलाधिकारियों पर थी।
कांग्रेस ने इस आदेश पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 (संशोधित 2019) की धारा 9 की उपधारा (6) और (7) का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि यदि किसी प्रत्याशी का नाम दो अलग-अलग ग्राम पंचायतों या निकायों की मतदाता सूची में पाया जाता है, तो वह व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना जाएगा।
गरिमा दसौनी का तीखा प्रहार
कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि यह आदेश न केवल राज्य के पंचायती राज अधिनियम के खिलाफ है, बल्कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के भी विपरीत है। उन्होंने इसे “सत्ता का दुरुपयोग” और “प्रजातंत्र की जड़ों पर कुठाराघात” बताते हुए कहा:
“जब अधिनियम स्पष्ट रूप से ऐसे उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करता है, तो निर्वाचन आयोग द्वारा उल्टा निर्देश देना दोहरे मापदंड और सत्ता की हेकड़ी को दर्शाता है। यह जनादेश का अपमान है।”
उन्होंने यह भी कहा कि आयोग का आदेश ऐसे उम्मीदवारों को संरक्षण देने का प्रयास है जो नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।
नैनीताल हाई कोर्ट का हस्तक्षेप
आज मामले की सुनवाई नैनीताल हाई कोर्ट में हुई, जहां मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी। हाई कोर्ट ने यह माना कि आदेश में जो छूट दी गई है, वह कानून की मूल भावना और स्पष्ट प्रावधानों के विपरीत है।
गरिमा दसौनी ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हुए इसे “सत्य और प्रजातंत्र की जीत” बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला न केवल नियमों की रक्षा करता है बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखने में भी सहायक होगा।
विपक्ष का आरोप: सरकार का दबाव काम कर रहा है
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि यह पूरा आदेश राज्य सरकार के दबाव में लाया गया था। दसौनी ने इसे “दमनकारी नीति का हिस्सा” करार देते हुए कहा कि सरकार सत्ता में बने रहने के लिए चुनावी प्रक्रिया को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस ऐसी नीतियों के खिलाफ सड़क से लेकर सदन तक लड़ाई लड़ेगी।