केंद्र पर टिकी उम्मीदें

विशेष रिपोर्ट
  • मणिपुर के लोगों को राज्य सरकार से ज्यादा केंद्र सरकार पर भरोसा
  • मोदी सरकार ने दशकों से लंबित कई जटिल समस्याओं का समाधान कर की है मानवीय पहल

ममता सिंह, पूर्वोत्तर मामलों की जानकार।

आज पूरी दुनिया मणिपुर को हिंसा की लपटों के बीच परेशान देख रही है और चाहती है कि जल्द वहां स्थितियां सामान्य हों। चाहे कुकी हों या मैतेई दोनों ही राज्य का अभिन्न हिस्सा हैं और रहेंगे। लेकिन, वहां सक्रिय अलगाववादी ताकतों के मंसूबे कतई नेक नहीं हैं। तभी तो केंद्र और राज्य सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद हिंसा का यहां दौर थम नहीं रहा। और करीब 45 हजार नागरिकों को अपने ही राज्य में आंतरिक रूप से विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है। काफी संख्या में लोग पलायन करके सीमावर्ती राज्यों में शरणार्थी जीवन जीने को मजबूर हैं।

इन तमाम घटनाक्रमों को याद करती हूं तो मेरे सामने पूर्वोत्तर राज्यों में पुरानी ग्राउंड रिपोर्टिंग की यादें, जातीय हिंसा के दशकों बाद एक पूरी पीढ़ी की बर्बादी का मंजर और कुछ वीभत्स चेहरे उभरकर सामने आ जाते हैं। कुछ जातीय हिंसा के परिणाम तो इतने भयावह रहे जिसे जेनोसाइड यानी नरसंहार कहना भी गलत न होगा।
अमूमन यह देखा गया है कि पूर्वोत्तर के लोगों की समस्याओं का समाधान निकालने में दशकों लग जाते हैं, , इसके पीछे एक कारण पूर्वोत्तर क्षेत्र की तरफ सरकारों का रवैया भारत के शेष राज्यों की तरह नहीं नहीं होना भी रहा है। आजादी के बाद से ही दिल्ली के शासकों की नजर यहां कम रही, इसलिए विकास को रफ्तार नहीं मिल सकी।

यानी उग्रवाद बढ़ने का एक कारण विकास का अभाव भी रहा। हालांकि, स्वतंत्रता पूर्व अविभाजित असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ने पूर्वोत्तर को भारत से जोड़ कर रखने में महती भूमिका निभाई। उनके प्रयासों के कारण ही असम, चीन और पूर्वी पाकिस्तान के हाथ जाने से बच पाया और ये भारत का अभिन्न अंग बना। लेकिन आजादी के डेढ़ दशक बाद तक पूर्वोत्तर के राज्य मेनलैंड से सड़क और रेल मार्ग से नहीं जुड़ पाए थे।

साल 1962 में ब्रहमपुत्र नदी पर सराईघाट रेल सह रोड ब्रिज बनने के बाद पहली बार स्थायी कनेक्टिविटी यहां हो पाई जिससे बाद इस क्षेत्र में शेष भारत से लोग आने-जाने लगे।
हालांकि, साल 2014 के बाद पूर्वोत्तर के आठों राज्यों में कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए। जैसे 18 साल के लंबे इंतजार के बाद 21 नवम्बर 2015 को दक्षिण असम ब्रॉड गेज से जुड़ा। पूर्वोत्तर की सीमा पर चीन से मिल रही चुनौतियों के बीच 2017-18 में सामरिक लिहाज से महत्वपूर्ण भूपेन हजारिका सेतु और बोगीबील ब्रिज पबन कर तैयार हुए। यह बात भी काबिलेगौर है कि भूपेन हजारिका सेतु भारत का सबसे लंबा सड़क पुल है।

इसकी खासियत ये है कि ये उत्तरी असम और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के बीच पहला स्थायी सड़क कनेक्शन है। वहीं, असम के डिब्रूगढ़ के पास बना बोगीबील ब्रिज अरूणाचल प्रदेश को सीधे तौर पर रेल-रोड मार्ग से जोड़ता है। यह देश का सबसे लंबा सड़क सह रेल पुल है। इस पुल को बनने में 17 साल से ज्यादा का वक्त लगे। उक्त खास प्रोजेक्ट्स का जिक्र इसलिए कर रही हूं कि ये सभी प्रोजेक्ट भले ही कांग्रेस शासनकाल के समय के हों लेकिन आखिर क्या वजहें रहीं कि इन्हें पूरा होते-होते दो दशक लग गए? इन प्रोजेक्ट्स का काम दशकों तक लंबित होने के पीछे भी मुख्य वजहों में केंद्र की ओर से फंड की कमी के साथ ही उग्रवाद भी रहा।

यह बात भी किसी से छिपी नहीं कि आजादी कई सालों बाद तक यहां के प्रोजेक्टों में काम करना भी अधिकारियों, कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों के लिए कम जोखिम भरा नहीं था। उग्रवादियों और उपद्रवियों द्वारा यहां रंगदारी और वसूली की परंपरा रही है। वहीं, तत्कालीन सरकारें भी उन्हें पूर्ण का भरोसा सुरक्षा दिलाने में विफल रहीं। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।
कांग्रेस ‘लुक ईस्ट ’ के तहत कार्य करती रही लेकिन भाजपा और उसकी सहयोगी दलों की सरकारें दस कदम दूर का सोचकर ‘ एक्ट ईस्ट ’ के तहत कार्य कर रही हैं। मौजूदा समय में सीमापार से मिल रही चुनौतियों से निपटने के साथ ही साउथ ईस्ट एशिया से जुड़ कर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के तहत म्यांमार, थाइलैंड, बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों के साथ जलमार्ग, सड़क और रेल मार्ग विस्तार के अलावा अरबों-खरबों रुपए की कई परियोजनाओं पर कार्य युद्धस्तर पर जारी हैं। ताकि, पूर्वोत्तर के राज्य भारत के विकास का ग्रोथ इंजन बन सकें।

यह बात भी काबिले गौर है कि पूर्वोत्तर में विभिन्न राज्यों के बीच लंबे समय से लंबित विवाद क्षेत्र के विकास में एक प्रमुख चिंता का विषय रहे हैं। केंद्र सरकार के सक्रिय प्रयासों से कई दशकों से चले आ रहे विवाद आखिरकार स्थायी रूप से सुलझने लगे हैं। इसने एकीकरण और विश्वास को बढ़ावा दिया है और दीर्घकालिक शांति और प्रगति के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त किया है। और उसके अपेक्षित परिणाम का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछेक राज्यों को यदि छोड़ दिया जाए तो उग्रवाद का पूर्वोत्तर से लगभग सफाया हो गया है।

सैकड़ों युवाओं ने बंदूक छोड़ कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ गए हैं। भारत सरकार उनके गुजर बसर के लिए उन्हें आर्थिक संबल भी प्रदान कर रही है। साथ ही, त्रिपुरा और मेघालय पूरी तरह से सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम यानी अफस्पा से मुक्त हो गया। जबकि अन्य राज्यों असम, मणिपुर, अरुणाचल और नागालैंड में अफस्पा को काफी सीमित कर दिया गया है। हाल के वर्षों में भारत सरकार ने उग्रवाद की समस्या के समाधान के लिए कई अलगाववादी संगठनों के साथ शांति वार्ता किया। कई सक्रिय अलगाववादी संगठनों के कैंपों पर सैन्य कार्रवाई के अलावा भारत-म्यांमार सेना का संयुक्त अभियान भी चलाया गया। इसी का नतीजा है कि कई सशस्त्र विद्रोही संगठन केंद्र के साथ संघर्ष विराम करके शांति समझौते पर हैं।

इस बात में कोई संशय ही नहीं है कि दशकों से लंबित जनजातीय अधिकारों से जुड़े जटिल मुद्दों के समाधान की दिशा में साल 2014 के बाद काफी तेज गति से कई हुए। इस दौरान कई ऐतिहासिक समझौते भी हुए जो मानवीय नजरिए से देखें तो मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियां कहीं जा सकती हैं। आइए बताते हैं कि वो दशकों पुराने कौन से समझौते रहे जो जमीनी स्तर पर अमन चैन लाने में काफी हद तक मददगार रहे।

अगस्त 2019: नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा समझौता

1989 में गठित नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एनएलएफटी) हिंसा में शामिल रहा है, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार अपने शिविरों से काम कर रहा है। भारत सरकार और असम सरकार के साथ कई वर्षों की बातचीत के बाद, अगस्त 2019 में नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 44 हथियारों के साथ 88 कैडरों का आत्मसमर्पण हुआ।

16 जनवरी, 2020: ब्रू-रियांग समझौता

अक्टूबर 1997 में मिजोरम के पश्चिमी भाग में जातीय हिंसा के कारण बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक ब्रू (रियांग) परिवार 1997-1998 में उत्तरी त्रिपुरा में चले गए। 23 साल पुराने ब्रू-रियांग शरणार्थी संकट को हल करने के लिए हुए ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके द्वारा 37000 से अधिक आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों को त्रिपुरा में बसाया जा रहा है। उनके पुनर्वास का काम केंद्रीय राज्य मंत्री प्रतिमा भौमिक देख रही हैं। करीब 13 हजार लोगों ने बीते विधानसभा चुनाव में करीब 26 साल बाद आम नागरिक की तरह अपने मत का प्रयोग किया।

27 जनवरी, 2020: बोडो समझौता

1960 के दशक के दौरान, असम के बोडो और अन्य जनजातियों ने उदयाचल के अलग राज्य का आह्वान किया। 1980 के दशक के अंत में, बोडो – बोडोलैंड के लिए एक अलग राज्य और असम को 50-50 विभाजित करने की एक और मांग थी। इन निरंतर मांगों के परिणामस्वरूप, वर्षों से हिंसा की व्यापक घटनाएं हुई हैं। असम में पांच दशक पुराने बोडो मुद्दे को हल करने के लिए, जनवरी, 2020 में बोडो समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 1615 कैडरों ने भारी मात्रा में हथियारों और गोला-बारूद के साथ गुवाहाटी में आत्मसमर्पण किया।

04 सितंबर, 2021: कार्बी आंगलोंग समझौता

कार्बी असम का एक प्रमुख जातीय समूह है, जिसका इतिहास 1980 के दशक के अंत से हत्याओं, जातीय हिंसा, अपहरण और कराधान द्वारा चिह्नित किया गया है। असम के कार्बी क्षेत्रों में लंबे समय से चल रहे विवाद को हल करने के लिए, सितंबर, 2021 को कार्बी आंगलोंग समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें 1000 से अधिक सशस्त्र कैडरों ने हिंसा को त्याग दिया और समाज की मुख्यधारा में शामिल हो गए।

29 मार्च, 2022: असम-मेघालय अंतर्राज्यीय सीमा समझौता

असम और मेघालय राज्यों के बीच अंतर्राज्यीय सीमा विवाद के कुल बारह क्षेत्रों में से छह क्षेत्रों पर विवाद को निपटाने के लिए मार्च, 2022 को एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। अकेले इस समझौते से दोनों राज्यों के बीच करीब 65 फीसदी सीमा विवाद सुलझा लिए गए।
इन्हीं समझौतों का नतीजा रहा है कि आज पूर्वोत्तर के राज्यों में काफी हद तक शांतिपूर्ण माहौल है। भले ही आज मणिपुर अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा हो लेकिन यह बात भी काबिलेगौर है कि नागा समेत अन्य जनजातियां किसी तरह के उपद्रव से दूर हैं, वहीं सीमावर्ती राज्य मिजोरम, नागालैंड और असम की विभिन्न जाति और जनजातियों के लोग आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों की हर संभव मदद करने में जुटी हैं।
बहरहाल, पूर्वोत्तर राज्यों के पिछड़ने में उग्रवाद एक बड़ा कारण रहा है। क्योंकि यदि सुरक्षा और शांति ही नहीं रहेगी तो विकास हो भी जाए तो उसका समुचित लाभ लोगों को नहीं मिलेगा। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार लगातार कोशिश कर रही है कि इस तरह जनजातीय लोगों में वर्षों से पनप रही अलगाववाद की भावना को खत्म किया जाए । ऐसे में भारत सरकार की मंशा पर सवाल न करते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि यथाशीघ्र मैतेई और कुकी समुदाय की समस्याओं का कोई दीर्घकालीन सर्वसम्मत समाधान निकाला जाएगा। साथ ही, दोनों समुदाय के बीच शांति बहाल होगी और जनजीवन सामान्य होगा।

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