विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ में डॉ. आनंद भारद्वाज बने अधिष्ठाता, श्रीगोपाल नारसन को फिर मिली बड़ी जिम्मेदारी
रुड़की। हिंदी भाषा और साहित्य को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने के संकल्प के साथ बिहार के बाराहाट में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ का 27वां वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया गया। अधिवेशन में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे हिंदी विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों और नाट्यकर्मियों को उनके साहित्यिक एवं अकादमिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस दौरान विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ की नई कार्यपरिषद का गठन भी किया गया।
उत्तराखंड से साहित्यिक सेवाओं के लिए डॉ. आनंद भारद्वाज, डॉ. श्रीगोपाल नारसन और वीके डोभाल को साहित्य भूषण सम्मान प्रदान किया गया। वहीं, नई कार्यपरिषद में उत्तराखंड के साहित्यकारों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।
कार्यपरिषद के नवगठन के तहत डॉ. देवेंद्र नाथ शाह (बिहार) को कुलाधिपति, डॉ. आनंद भारद्वाज (उत्तराखंड) को अधिष्ठाता और डॉ. प्रेमचंद पांडेय (झारखंड) को कुलपति नियुक्त किया गया है। इसके अलावा डॉ. श्रीगोपाल नारसन और वीके डोभाल को उपकुलपति तथा कुमार प्रीतम (बिहार) को कुलसचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कार्यपरिषद में अन्य राज्यों के प्रतिनिधियों को भी स्थान दिया गया है।
डॉ. श्रीगोपाल नारसन ने बताया कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के शासक धर्मपाल ने वर्ष 775 ईस्वी में की थी। वर्ष 800 से 1200 ईस्वी के बीच यह शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जहां लगभग दस हजार विद्यार्थी अध्ययन करते थे। उन्होंने बताया कि मुगलकाल में इस विश्वविद्यालय को जला दिया गया था। बाद में 18वीं सदी से हिंदीसेवियों के प्रयासों से इस संस्था को पुनर्जीवित करने की पहल हुई।
उन्होंने कहा कि तब से विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अधिवेशन में हिंदी के संरक्षण, संवर्धन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी प्रतिष्ठा बढ़ाने के संकल्प को भी दोहराया गया।
कार्यपरिषद में उत्तराखंड के साहित्यकारों को मिली जिम्मेदारियों और सम्मान को प्रदेश के साहित्यिक जगत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
