देहरादून। उत्तराखंड में किसानों के मुद्दे को लेकर सियासत तेज हो गई है। खानपुर विधायक उमेश कुमार की ओर से गैरसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाने और इस्तीफे की पेशकश करने के बाद कांग्रेस ने पलटवार किया है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि किसानों के हितों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन दूसरों पर सवाल उठाने से पहले जनप्रतिनिधियों को अपने कामकाज का हिसाब भी जनता के सामने रखना चाहिए।
दसौनी ने उमेश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस पर किसानों के मुद्दों को लेकर निष्क्रिय रहने का आरोप लगाने से पहले उन्हें अपने कार्यकाल में किसानों के हित में किए गए ठोस कार्यों का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों के प्रति प्रतिबद्धता केवल बयान देने या इस्तीफे की पेशकश करने से साबित नहीं होती, बल्कि इसके लिए जमीनी स्तर पर लगातार काम करना जरूरी है।
किसान आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका याद दिलाई
गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन ने केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बनाया था। किसानों के लंबे संघर्ष और विरोध के बाद आखिरकार केंद्र सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में भी कांग्रेस ने किसानों की समस्याओं को लेकर समय-समय पर आवाज उठाई है। किसानों की आत्महत्याओं, कृषि संकट और खेती से जुड़ी परेशानियों के मुद्दे पर पार्टी ने सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष किया और प्रभावित परिवारों की समस्याओं को सामने रखा।
दसौनी ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में किसानों के हितों की रक्षा और कर्ज में डूबी चीनी मिलों को उबारने के लिए प्रयास किए। उन्होंने दावा किया कि आज भी कांग्रेस के नेता किसानों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझ रहे हैं और उनके साथ खड़े हैं।
इस्तीफे की पेशकश पर भी उठाए सवाल
कांग्रेस प्रवक्ता ने उमेश कुमार की इस्तीफे की पेशकश पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसानों की समस्याएं वास्तव में उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण हैं, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि इन समस्याओं के समाधान के लिए अब तक क्या ठोस पहल की गई है।
उन्होंने कहा कि किसानों के मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगना, समस्याओं के समाधान के लिए दबाव बनाना और किसानों के अधिकारों की लड़ाई लगातार लड़ना ही किसी जनप्रतिनिधि की वास्तविक जिम्मेदारी है। केवल नैतिकता का दावा करने के बजाय अपने कामों के जरिए प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए।
जनहित के मुद्दों पर गंभीर चर्चा की जरूरत
दसौनी ने कहा कि उत्तराखंड की राजनीति में जनहित, शालीनता और जनसेवा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। प्रदेश की जनता बेरोजगारी, पलायन, किसानों की बदहाली और आम लोगों की समस्याओं पर गंभीर चर्चा चाहती है, न कि व्यक्तिगत विवादों और शक्ति प्रदर्शन पर केंद्रित राजनीति।
उन्होंने आरोप लगाया कि खानपुर विधायक अपने कार्यकाल में क्षेत्र की समस्याओं के बजाय राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में अधिक उलझे दिखाई दिए। उनके अनुसार, जनप्रतिनिधियों का आचरण उत्तराखंड की संस्कृति और जनअपेक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए।
दसौनी ने कहा कि उमेश कुमार की इस्तीफे की पेशकश के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह किसानों के हित में आगे क्या ठोस कदम उठाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों के नाम पर किए जाने वाले दावों की असली परीक्षा बयानों से नहीं, बल्कि काम और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से होती है।
