नई दिल्ली। चाय की दुकान से लेकर ऑनलाइन खरीदारी तक यूपीआई आज देश में डिजिटल भुगतान का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। लेकिन अब यूपीआई भुगतान से जुड़ी शुल्क व्यवस्था में बदलाव होने जा रहा है। 15 अक्टूबर 2026 से चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होगा। हालांकि यह शुल्क सीधे आम ग्राहक से नहीं लिया जाएगा।
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने विकसित किया है। इसकी शुरुआत 2016 में हुई थी। 11 अप्रैल 2016 को मुंबई में इसका पायलट लॉन्च किया गया था और शुरुआत में 21 बैंक इससे जुड़े थे। इसके बाद यूपीआई का विस्तार तेजी से हुआ और यह देश के डिजिटल भुगतान तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
यूपीआई की खासियत इसकी इंटरऑपरेबिलिटी है। इसके जरिए अलग-अलग बैंकों के खातों से भुगतान किया जा सकता है और हर बार बैंक खाता संख्या तथा IFSC कोड साझा करने की जरूरत नहीं पड़ती। यूपीआई आईडी, क्यूआर कोड और संबंधित बैंकिंग ऐप के जरिए भुगतान किया जाता है। लेनदेन को अधिकृत करने के लिए यूपीआई पिन का इस्तेमाल होता है, जिसे किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए।
नए MDR ढांचे के तहत 2,000 रुपये तक के पात्र मर्चेंट भुगतान पर शुल्क नहीं लगेगा। वहीं व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P भुगतान भी मुफ्त रहेगा। 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा P2M भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लगेगा और 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी।
इस व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई है। विपक्ष की ओर से राहुल गांधी ने सरकार के फैसले की आलोचना की है, जबकि सरकार की ओर से कहा गया है कि शुल्क ढांचे का उद्देश्य यूपीआई के बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और पूरे भुगतान तंत्र को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाना है। सरकार ने यह भी कहा है कि उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई भुगतान शुल्क-मुक्त रहेगा। इसलिए आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे अहम बात यह है कि नया MDR मुख्य रूप से पात्र व्यापारी लेनदेन से जुड़ा है, न कि सामान्य व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान से।