नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। खाड़ी और अरब देशों की आपूर्ति में आई बाधाओं के बीच भारत ने केन्या को पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और प्रमुख व्यापार मार्गों में व्यवधान के कारण केन्या को अपने ईंधन स्रोतों में बदलाव करना पड़ा, जिसका सीधा फायदा भारतीय रिफाइनरों को मिला है।
केन्या लंबे समय से सरकारी समर्थन वाले समझौतों के तहत पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन की खरीद करता रहा है। इसकी प्रमुख आपूर्ति सऊदी अरामको, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी और एमिरेट्स नेशनल ऑयल कंपनी जैसी कंपनियों से होती थी। हालांकि, पश्चिम एशिया में आपूर्ति प्रभावित होने और वैश्विक बाजार की बदलती परिस्थितियों के चलते केन्या ने भारत से ईंधन खरीद बढ़ा दी।
ऊर्जा क्षेत्र के विश्लेषकों और बाजार आंकड़ों के मुताबिक भारत अब केन्या को गैसोलीन, डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल की आपूर्ति में सबसे आगे निकल गया है। भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता इस बदलाव की प्रमुख वजह मानी जा रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल रिफाइनर और एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रिफाइनिंग देश है। देश में 22 चालू रिफाइनरियों की कुल वार्षिक क्षमता करीब 258.1 मिलियन टन है। भारत अपनी घरेलू जरूरतों का 90 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसके बाद देश की रिफाइनरियां कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और अन्य उत्पादों में बदलकर वैश्विक बाजारों में निर्यात करती हैं।
गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज का विशाल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स भारत की इस क्षमता का प्रमुख उदाहरण है।
अफ्रीकी बाजार में भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों की मांग भी तेजी से बढ़ी है। हालिया एक महीने में अफ्रीका को भारत के पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात सालाना आधार पर 66 प्रतिशत बढ़ा है। यूरोपीय संघ की पाबंदियों के बाद भारतीय पेट्रोलियम कार्गो का एक हिस्सा यूरोप के बजाय अफ्रीकी बाजारों की ओर मुड़ा।
वहीं, यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी रिफाइनरियों पर बढ़े दबाव के बीच रूस द्वारा भी भारत से पेट्रोलियम उत्पाद खरीदना शुरू करना भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है।