नई दिल्ली। भारत में हाथियों की संख्या भले ही बढ़ रही हो, लेकिन उनके प्राकृतिक आवागमन के रास्ते यानी हाथी कॉरिडोर लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। इसके चलते मानव और हाथियों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर में हाथी कॉरिडोर का नए सिरे से सर्वेक्षण कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फसलों को नुकसान की आशंका के आधार पर इन महत्वपूर्ण गलियारों को छोटा नहीं किया जा सकता।
यह मामला हाथियों को भगाने के लिए आग के गोले और अन्य कथित क्रूर तरीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग से जुड़ी सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत का जोर हाथियों के सुरक्षित आवागमन और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण पर रहा।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में करीब 22,446 हाथी हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या पश्चिमी घाट क्षेत्र में है, जहां लगभग 11,934 हाथी पाए जाते हैं। कर्नाटक इस क्षेत्र का प्रमुख केंद्र है। इसके बाद पूर्वोत्तर भारत का स्थान है, जिसमें असम सहित आसपास के राज्य शामिल हैं। शिवालिक और गंगा के मैदानी क्षेत्र, खासकर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में करीब 2,062 हाथी मौजूद हैं।
हाथी कॉरिडोर ऐसे प्राकृतिक रास्ते हैं, जो अलग-अलग जंगलों और बड़े हाथी आवासों को आपस में जोड़ते हैं। इन्हीं रास्तों से हाथी भोजन, पानी और सुरक्षित आवास की तलाश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, एक नर हाथी की आवाजाही का क्षेत्र 40 से 300 वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है। ऐसे में कॉरिडोर का सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है।
पिछले वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे लाइन, नहर, खनन और अन्य विकास परियोजनाओं के कारण हाथियों के पारंपरिक रास्ते प्रभावित हुए हैं। रास्ते बाधित होने पर हाथी खेतों और आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ते हैं, जिससे फसलों को नुकसान और मानव-हाथी संघर्ष बढ़ता है।
2023 के सर्वेक्षण में 15 राज्यों में 150 हाथी कॉरिडोर दर्ज किए गए थे। पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 26 कॉरिडोर मिले थे। वहीं छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच चारमार-जिंगोल कॉरिडोर 80 से 100 हाथियों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।