ईरान के साथ जारी संघर्ष और मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव किया है। अमेरिकी प्रशासन ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र से अपना अंतिम विमानवाहक पोत भी वापस बुलाकर उसे मध्य पूर्व में तैनात करने का फैसला किया है। इस कदम के बाद पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में फिलहाल अमेरिका का कोई विमानवाहक पोत मौजूद नहीं रहेगा।
जानकारी के अनुसार, यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को मध्य पूर्व में तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह भेजा गया है। अमेरिकी नौसेना के इस बदलाव को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी सैन्य मौजूदगी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर ताइवान, जापान और फिलीपींस जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों के लिए यह घटनाक्रम चिंता बढ़ाने वाला है।
अमेरिकी नौसेना लंबे समय से मध्य पूर्व में लगातार सैन्य अभियानों में व्यस्त है। इससे जहाजों और सैनिकों पर दबाव बढ़ने की बात सामने आ रही है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, एशिया से विमानवाहक पोत हटाने का फैसला क्षेत्र में अमेरिकी रणनीतिक उपस्थिति को लेकर सवाल खड़े कर सकता है।
चीन ने अमेरिका के इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। चीन का कहना है कि अमेरिका के एशिया से पीछे हटने से उसके सहयोगी देशों के सामने उसकी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो रही है। बीजिंग इस घटनाक्रम का इस्तेमाल क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कर रहा है। चीन ने दक्षिण चीन सागर और जापान के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियां भी बढ़ाई हैं।
हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने अपने सहयोगियों को भरोसा दिलाया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति उसकी सुरक्षा प्रतिबद्धताएं कमजोर नहीं हुई हैं और जरूरत पड़ने पर दूसरे युद्धपोतों की तैनाती की जा सकती है।
उधर, मध्य पूर्व में तनाव लगातार जारी है। लेबनान के अंसार कस्बे में इजरायली हवाई हमले में कम से कम सात लोगों की मौत और दो के घायल होने की खबर है। वहीं होर्मुज जलडमरूमध्य में यूएई की ऊर्जा कंपनी एडनॉक के एक तेल टैंकर पर संदिग्ध हमला हुआ। यूएई ने इसके लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। इन घटनाओं से मध्य पूर्व के साथ-साथ वैश्विक रणनीतिक तनाव भी बढ़ता दिख रहा है।