कैंसर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, 19 राज्यों पर नजर

नई दिल्ली। कैंसर को नोटिफिएबल डिजीज यानी अधिसूचित बीमारी की श्रेणी में शामिल करने को लेकर देश में बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उन 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं, जहां अभी तक कैंसर को इस श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है। कोर्ट के इस निर्देश के बाद कैंसर के मामलों की व्यवस्थित निगरानी और पंजीकरण को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं।

नोटिफिएबल डिजीज ऐसी बीमारियां होती हैं, जिनके मामलों की जानकारी डॉक्टरों, अस्पतालों और चिकित्सा प्रयोगशालाओं को संबंधित स्वास्थ्य विभाग को देना अनिवार्य होता है। इसका मकसद बीमारी के मामलों का सटीक रिकॉर्ड तैयार करना, उसके फैलाव और स्थिति पर नजर रखना तथा जरूरत के अनुसार समय रहते उपचार और नियंत्रण की रणनीति तैयार करना है।

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी के लिए महामारी रोग अधिनियम, 1897 समेत कई कानूनी प्रावधान लागू हैं। स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय होने के कारण अलग-अलग राज्यों में अधिसूचित बीमारियों की सूची में कुछ अंतर हो सकता है। वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) देशभर में विभिन्न बीमारियों से जुड़े आंकड़ों की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

देश में तपेदिक, मलेरिया, डेंगू, हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस, कोविड-19, पोलियो, खसरा, डिप्थीरिया और रेबीज जैसी कई गंभीर बीमारियां पहले से ही नोटिफिएबल श्रेणी में हैं। इनके मामलों की सूचना स्वास्थ्य अधिकारियों तक पहुंचने से बीमारी की स्थिति का आकलन और आवश्यक कदम उठाना आसान होता है।

कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित करने की मांग एक डॉक्टर की जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। याचिका में कैंसर के मामलों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार करने, बीमारी की समय पर पहचान और मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया गया था।

संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों के बाद देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 17 पहले ही कैंसर को नोटिफिएबल श्रेणी में शामिल कर चुके हैं। अब बाकी 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इस दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।

कैंसर के मामलों का व्यापक और सटीक डेटा उपलब्ध होने से सरकार को अस्पतालों, दवाओं, जांच सुविधाओं और उपचार केंद्रों की बेहतर योजना बनाने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए विश्वसनीय आंकड़े सबसे अहम आधार होते हैं।

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