रेप की कोशिश (अटेम्प्ट टू रेप) से जुड़े मामलों में पटना और इलाहाबाद हाईकोर्ट की कुछ टिप्पणियों को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। दोनों अदालतों ने अलग-अलग मामलों में ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिनमें कहा गया था कि केवल महिला का सलवार उतारना या स्तन दबाना अपने आप में रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। इन टिप्पणियों पर अब सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने गंभीर चिंता जताई है।
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने कहा कि यौन अपराधों की व्याख्या केवल शारीरिक कृत्यों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता की गरिमा, उसकी सहमति, मानसिक आघात, भय और घटना के समग्र प्रभाव को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल कानून की तकनीकी व्याख्या करना नहीं, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाना भी है।
रहाटकर ने चेतावनी दी कि यदि अदालतें केवल कानूनी परिभाषाओं पर ध्यान देंगी और कानून की मूल भावना तथा पीड़िता के अनुभवों को नजरअंदाज करेंगी, तो इससे न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की गरिमा, उनके शारीरिक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा की रक्षा न्याय प्रणाली की सर्वोच्च जिम्मेदारी है।
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने भी इन मामलों पर असंतोष जताते हुए देशभर की अदालतों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया है कि नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी द्वारा तैयार न्यायिक संवेदनशीलता संबंधी रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट की वेबसाइटों पर उपलब्ध कराया जाए।
इसके साथ ही राज्यों को निर्देश दिया गया है कि सभी पुलिस थानों को इन दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया जाए, ताकि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने के दौरान पीड़िता के अधिकारों और संवेदनशीलता का पूरा ध्यान रखा जा सके। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर न्याय व्यवस्था में पीड़िता-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत को प्रमुखता से सामने ला दिया है।