भारत ने ईरान में प्रस्तावित चाबहार-जहेदान रेल कॉरिडोर को लेकर अपनी रणनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं। करीब 700 किलोमीटर लंबी यह रेल परियोजना भारत के लिए व्यापार और सामरिक दृष्टि से बेहद अहम मानी जा रही है। इसके पूरा होने के बाद भारत को पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान समेत मध्य एशिया के कई देशों तक सीधी पहुंच मिल सकेगी।
यह रेल लाइन ईरान के चाबहार बंदरगाह को जहेदान शहर से जोड़ेगी, जिससे यह ईरान के राष्ट्रीय रेल नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का हिस्सा बन जाएगी। इससे भारत को यूरेशिया और मध्य एशिया के बाजारों तक कम समय और कम लागत में माल पहुंचाने का नया विकल्प मिलेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह परियोजना चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के बढ़ते प्रभाव का रणनीतिक जवाब भी मानी जा रही है। चाबहार बंदरगाह और उससे जुड़ा रेल नेटवर्क भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करेगा और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा।
परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1.5 अरब डॉलर बताई जा रही है। इसमें अधिकांश निवेश ईरान करेगा, जबकि भारत अगले कुछ वर्षों में 400 से 500 मिलियन डॉलर का योगदान देगा। इसके अलावा भारतीय विशेषज्ञ परियोजना के निर्माण और तकनीकी सहयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
भारतीय रेलवे के पूर्व महाप्रबंधक सुधांशु मणि के अनुसार, यह रेल कॉरिडोर केवल व्यापारिक परियोजना नहीं बल्कि भारत की दीर्घकालिक सामरिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके जरिए मध्य एशिया के भू-आवेष्ठित देशों को हिंद महासागर तक सबसे छोटा और सुविधाजनक समुद्री मार्ग मिलेगा, जिससे क्षेत्रीय व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि चाबहार-जहेदान रेल परियोजना के पूरा होने से भारत की वैश्विक व्यापारिक पहुंच मजबूत होगी और क्षेत्र में उसका रणनीतिक प्रभाव भी पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ेगा।