तीन दशक का सफर: दुख की जगह अब उम्मीद और आत्मसम्मान

'पीड़ित' नहीं 'विजेता' हैं ब्रू: बुजुर्ग महिलाओं की आंखों में दिखा कृतज्ञता का भाव

  • भव्य स्वागत की गवाह: नई दिल्ली से पहुंची वरिष्ठ पत्रकार ममता सिंह का कैंप में जोरदार अभिनंदन
  • संसदीय चैनल लोकसभा टेलीविजन के जरिए भारत सरकार तक पहुंचाई पीड़ितों के मन की बात
  • पूरी मानवीय त्रासदी पर बेबाक ग्राउंड रिपोर्टिंग कर देश-दुनिया में पहुंचाई 21 साल से शिविरों में शरणार्थी जीवन जी रहे करीब 45 हजार लोगों की व्यथा

युवराज क्षेत्री

कंचनपुर (उत्तर त्रिपुरा)। नाइसिंगपाड़ा कैंप की संकरी और कभी कीचड़ से पटी रहने वाली गलियों में आज दुख या बेबसी की जगह उम्मीद और आत्मसम्मान की एक नई भाषा तैर रही है। 1997 की उस खूनी रात को बीते करीब तीन दशक होने को हैं, लेकिन आज यहां का नजारा बदला हुआ है। मंगलवार, 7 जुलाई को वरिष्ठ पत्रकार ममता सिंह के स्वागत में उमड़ी भारी भीड़ इस बात का जीवंत सबूत थी कि यह समुदाय अब खुद को ‘विक्टिम’ (पीड़ित) नहीं, बल्कि अपनी किस्मत का निर्माता यानी ‘विजेता’ मान रहा है।

कैंप की बुजुर्ग महिलाओं ने जब ममता सिंह के हाथों को अपने कांपते हुए हाथों में लिया, तो वह सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी। वह सालों के लंबे संघर्ष और आंसुओं की साझी गवाह को दिया गया एक मूक सम्मान था। ममता सिंह ने लंबे समय तक लोकसभा टीवी (अब संसद टीवी) के लिए इस पूरी मानवीय त्रासदी पर बेबाक ग्राउंड रिपोर्टिंग की थी। आज वही पत्रकार जब इनके बदले हुए सुनहरे कल को अपनी आंखों से देखने पहुंचीं, तो बुजुर्गों की आंखों की चमक और स्कूल जाते बच्चों की खिलखिलाती मुस्कान ने साफ कर दिया कि ऐतिहासिक ‘2020 के चतुष्पक्षीय समझौते’ ने इन्हें सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि खोया हुआ सम्मान और एक नई जिंदगी दी है।

इतिहास के पन्ने: स्वायत्तता की ललक से पलायन की त्रासदी तक

रियांग यानी ‘ब्रू’ जनजाति पूर्वोत्तर भारत की एक अत्यंत प्राचीन जनजाति है, जिसे भारतीय संविधान के तहत त्रिपुरा में ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह’ (पीवीटीजी) का दर्जा प्राप्त है। मूल रूप से मिजोरम के निवासी रहे इन लोगों की जिंदगी 1990 के दशक में उस वक्त बदल गई, जब चकमा और मारा समुदायों की तर्ज पर इन्होंने भी अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए ‘स्वायत्त जिला परिषद’ (एडीसी) की मांग की।

यह मांग मिजोरम के बहुसंख्यक संगठनों को रास नहीं आई और तनाव बढ़ता गया। अक्टूबर 1997 में डम्पा टाइगर रिजर्व में एक मिजो वन अधिकारी की हत्या के बाद जातीय हिंसा भड़क उठी। गांवों में ‘राज्य छोड़ो’ के पोस्टर लगा दिए गए। नतीजतन, करीब 40,000 ब्रू आदिवासी अपनी जमीन, मवेशी और पुरखों की यादें छोड़कर रातों-रात जान बचाने के लिए त्रिपुरा की ओर भाग निकले। घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए न जाने कितने मासूमों ने दम तोड़ दिया था।

2020 का ऐतिहासिक मोड़: वनवास का अंत

सालों तक तिरपाल की फटी छतों के नीचे और सरकारी राशन के भरोसे अपमानजनक जीवन जीने के बाद, इस समुदाय के लिए नया सवेरा जनवरी 2020 में आया। केंद्र सरकार, त्रिपुरा सरकार, मिजोरम सरकार और ब्रू प्रतिनिधियों के बीच एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय पुनर्वास समझौता हुआ।

इस समझौते के तहत त्रिपुरा में ही इनके स्थायी पुनर्वास का खाका खींचा गया, जिसके तहत प्रत्येक विस्थापित परिवार को 1,200 वर्ग फुट (करीब 2.7 गंडा) का आवासीय भूखंड दिया जा रहा है।
मकान बनाने के लिए ₹1.5 लाख की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता दी गई।
हर परिवार को ₹4 लाख की सावधि जमा (Fixed Deposit) और दो साल तक प्रति माह ₹5,000 की नकद सहायता के साथ मुफ्त राशन दिया जा रहा है।
बदलाव की बयार: आज कंचनपुर के इन कैंपों में सीताराम, अमर, गोविंद और राधा जैसे नाम न सिर्फ अपनी सनातनी परंपरा की गवाही दे रहे हैं, बल्कि नए पक्के मकानों, आधार कार्ड, वोटर आईडी और सरकारी स्कूलों के जरिए देश की मुख्यधारा से मजबूती से जुड़ चुके हैं।

जो ब्रू समुदाय कभी कंचनपुर के कैंपों की फाइलों में दफन होने को मजबूर था, आज वह त्रिपुरा की धरती पर सम्मान से सिर उठाकर जी रहा है। बुजुर्ग महिलाओं की आंखों की कृतज्ञता यह बताने के लिए काफी है कि अब उनका वनवास खत्म हो चुका है और वे अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ने को तैयार हैं।

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