मुंबई। महाराष्ट्र विधानमंडल का मानसून सत्र सोमवार, 22 जून से शुरू होकर 10 जुलाई तक चलेगा। इस बार का सत्र कई मायनों में खास माना जा रहा है, क्योंकि विधानसभा और विधान परिषद दोनों ही सदनों में नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त है। ऐसे में सरकार को घेरने की विपक्ष की क्षमता और रणनीति को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
विधानसभा में राज्य सरकार के गठन के बाद से अब तक नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति नहीं हो सकी है। वहीं विधान परिषद में अंबादास दानवे का कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह पद भी खाली पड़ा है। राज्य की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में हुई टूट-फूट और बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण विपक्ष की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर नजर आ रही है।
विधानसभा में उद्धव ठाकरे गुट 20 विधायकों के साथ तकनीकी रूप से सबसे बड़ा विपक्षी दल है, लेकिन उसके भीतर भी राजनीतिक अस्थिरता और संभावित टूट की चर्चाएं जारी हैं। दूसरी ओर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार गुट को लेकर भी नए राजनीतिक समीकरण बनने की अटकलें लगाई जा रही हैं। कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव गुट) और एनसीपी (शरद गुट) के पास अनुभवी नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन आंतरिक मतभेद और समन्वय की कमी विपक्ष की धार को कमजोर कर रही है।
विपक्षी दल यह आरोप भी लगा रहे हैं कि सरकार ने उनके विधायकों के विकास निधि में कटौती की है, जिससे उनके निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। इसी वजह से कई विपक्षी नेता सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने से बचते दिखाई दे रहे हैं।
मानसून सत्र के दौरान किसानों की समस्याएं, कर्जमाफी, जल संकट, प्याज उत्पादकों के आंदोलन, महंगाई, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरा जा सकता है। इसके अलावा शक्तिपीठ महामार्ग परियोजना का विरोध, केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप और सामाजिक उप-वर्गीकरण जैसे विषय भी सदन में गूंज सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेता प्रतिपक्ष के अभाव में विपक्ष इन मुद्दों को कितनी प्रभावी ढंग से उठा पाएगा, यही इस पूरे सत्र की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।