नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इन दिनों गंभीर आंतरिक संकट से गुजरती दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पार्टी को बचाने के लिए बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती की तरह कोई बड़ा और कठोर कदम उठाएंगी।
सूत्रों के अनुसार, चुनावी हार के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और जनप्रतिनिधि नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। बताया जा रहा है कि करीब 60 विधायकों और दोनों सदनों के 30 से अधिक सांसदों ने संगठन की मौजूदा दिशा को लेकर नाराजगी जताई है। आरोप है कि पार्टी के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया सीमित दायरे में सिमट गई, जिससे पुराने और जमीनी नेताओं की भूमिका कमजोर होती चली गई।
टीएमसी के वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने भी संगठन की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की है। उनका मानना है कि जमीनी कार्यकर्ताओं और अनुभवी नेताओं की अनदेखी ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। पार्टी के एक वर्ग का आरोप है कि चुनावी रणनीति, टिकट वितरण और संगठनात्मक नियुक्तियों में संतुलन की कमी रही, जिसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी के सामने अब चुनौती केवल विपक्ष से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की भी है। ऐसे में उनके सामने दो विकल्प बताए जा रहे हैं। पहला, वरिष्ठ नेताओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए संगठन में व्यापक बदलाव किए जाएं। दूसरा, वर्तमान नेतृत्व संरचना को बरकरार रखा जाए और असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर चलने का प्रयास किया जाए।
हालांकि, पार्टी की ओर से आधिकारिक तौर पर किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं दिया गया है, लेकिन लगातार सामने आ रही नाराजगी ने टीएमसी के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबकी निगाहें ममता बनर्जी के अगले कदम पर टिकी हैं, क्योंकि वही तय करेगा कि पार्टी इस संकट से उबर पाएगी या नहीं।