प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं की गंभीर चिंताओं के बाद हाईकमान ले रहे निर्णय
चुनावी रिकॉर्ड के बावजूद संगठन महामंत्री को सम्मानजनक तरीके से राजस्थान भेजा
-अमरनाथ सिंह, देहरादून।
उत्तराखंड भाजपा में सांगठनिक भूचाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। संगठन महामंत्री अजय कुमार की रवानगी के बाद अब राज्य के पार्टी प्रभारी दुष्यंत गौतम की भी छुट्टी लगभग तय मानी जा रही है। अंकिता भंडारी हत्याकांड मामले में लगातार नाम उछलने और विवादों में घिरे रहने के कारण केंद्रीय नेतृत्व दुष्यंत गौतम की विदाई की भी पूरी स्क्रिप्ट तैयार कर चुका है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के इस चौतरफा ‘डैमेज कंट्रोल’ ने साफ कर दिया है कि हाईकमान राज्य में जनता के गुस्से को शांत करने के लिए किसी भी बड़े चेहरे की बलि लेने से पीछे नहीं हटेगा।
उत्तराखंड भाजपा में संगठन महामंत्री अजय कुमार की विदाई केवल एक सामान्य सांगठनिक फेरबदल नहीं, बल्कि इसी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। सितंबर 2019 से कमान संभाल रहे अजय कुमार का चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड बेहद शानदार रहा, जिसके तहत भाजपा ने विधानसभा, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके बावजूद, पिछले कुछ समय से अंकिता भंडारी प्रकरण के विवादों में उनका और प्रभारी दुष्यंत गौतम का नाम घसीटे जाने से राज्य का सामाजिक ताना-बाना और जनभावनाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही थीं। विपक्षी कांग्रेस और यूकेडी इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर लगातार आक्रामक हैं, जिससे भाजपा के भीतर आगामी चुनावों को लेकर चिंता गहरी हो गई थी।
इसी राजनीतिक माहौल की गंभीरता को भांपते हुए राष्ट्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड दौरे के दौरान कोर कमेटी, मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं से गहन मंत्रणा की थी। सूत्रों के मुताबिक, सूबे के कई कद्दावर नेताओं ने स्पष्ट फीडबैक दिया कि इन दोनों बड़े नेताओं का अब राज्य में बने रहना चुनावी लिहाज से आत्मघाती साबित हो सकता है। नतीजा सबके सामने है—अजय कुमार को जहां सम्मानजनक तरीके से राजस्थान भेज दिया गया, वहीं दुष्यंत गौतम की रुखसती का भी काउंटडाउन शुरू हो चुका है।
इन बड़े बदलावों के बाद अब नए रणनीतिकारों के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। उत्तराखंड की अनूठी भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को संभालना नए चेहरों के लिए आसान नहीं होगा। खासकर तब, जब राज्य में अंकिता भंडारी मामले को लेकर जनता के बीच एक तीखी अंतर्धारा बह रही है। नए सिपहसालारों के सामने सभी 70 विधानसभा सीटों पर सांगठनिक पकड़ मजबूत करने, पार्टी के भीतर के अंतर्विरोधों को शांत करने और जनता के बीच खोए भरोसे को बहाल करने की दोहरी चुनौती होगी। भाजपा का यह कड़ा रुख साफ संकेत देता है कि पार्टी सत्ता विरोधी लहर और संवेदनशील मुद्दों के नुकसान से बचने के लिए किसी भी हद तक सख्त फैसले लेने के मूड में है।