अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच देश में पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम आम लोगों की चिंता बढ़ा रहे हैं। हाल के दिनों में तेल कंपनियों द्वारा ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी किए जाने के बाद विपक्षी दलों और उपभोक्ता संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकारों पर टैक्स कम करने का दबाव बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत का बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में वसूला जाता है। अनुमान के मुताबिक पेट्रोल-डीजल की कुल कीमत में लगभग 35 से 50 प्रतिशत हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स का होता है। केंद्र सरकार जहां एक्साइज ड्यूटी लगाती है, वहीं राज्य सरकारें वैट और अन्य स्थानीय कर वसूलती हैं।
जानकारों के अनुसार यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर टैक्स में करीब 30 प्रतिशत तक कटौती करें तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 8 से 15 रुपये प्रति लीटर तक की कमी आ सकती है। इससे आम जनता को महंगाई से राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि ईंधन की कीमतों का सीधा असर परिवहन, खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ता है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और आयात लागत तेल कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बना रही हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले बदलावों का असर घरेलू कीमतों पर भी पड़ता है।
वहीं, बढ़ती महंगाई के बीच आम लोग सरकार से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि सरकार को टैक्स ढांचे की समीक्षा करनी चाहिए ताकि जनता पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम किया जा सके। आने वाले समय में केंद्र और राज्य सरकारें ईंधन पर टैक्स में राहत देती हैं या नहीं, इस पर लोगों की नजर बनी हुई है।