दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ता संघर्ष और अमेरिका-चीन के बीच सामरिक प्रतिस्पर्धा ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के पुराने ढांचे को प्रभावित किया है। जो सप्लाई नेटवर्क कभी वैश्विक अर्थव्यवस्था की ताकत माने जाते थे, वे अब रणनीतिक दबाव और राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल होने लगे हैं। ऐसे माहौल में भारत की ऊर्जा और रक्षा सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की बाधा भारत के लिए बड़ा संकट पैदा कर सकती है। भारत अपनी तेल और गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इसका अधिकांश परिवहन इसी मार्ग से होता है। यदि क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या ईरान और अमेरिका के बीच टकराव गहराता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार और भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।
इन परिस्थितियों ने भारत के सामने ऊर्जा आत्मनिर्भरता की जरूरत को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। केंद्र सरकार अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, घरेलू उत्पादन और रणनीतिक भंडारण पर तेजी से काम कर रही है। इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता कम करने की दिशा में भी बड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
सरकार डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 और प्रस्तावित डीएपी 2026 के जरिए घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। निजी कंपनियों को प्रोत्साहन और निवेश नियमों में ढील के कारण देश में हथियार निर्माण और रक्षा निर्यात में वृद्धि देखने को मिल रही है। इसका फायदा एमएसएमई सेक्टर को भी मिल रहा है, जिससे रोजगार और तकनीकी विकास को गति मिली है।
उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में विकसित हो रहे डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर देश को रक्षा उत्पादन का मजबूत केंद्र बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आत्मनिर्भरता की यह यात्रा लंबी जरूर है, लेकिन बदलते वैश्विक हालात में भारत के लिए यह आर्थिक और सामरिक रूप से बेहद जरूरी बन चुकी है।