कैमरे के सामने सेवा, कैमरे के पीछे सौदा: क्या सच में समाजसेवा बन गई है पब्लिसिटी का कारोबार?

आज के समय में समाजसेवा का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। जहां पहले सेवा का अर्थ निस्वार्थ भाव से जरूरतमंदों की मदद करना होता था, वहीं अब कई लोग इसे पहचान और प्रचार पाने का आसान माध्यम बना चुके हैं। कुछ तथाकथित समाजसेवी ऐसे भी हैं, जिनकी सेवा का दायरा कैमरे की फ्रेम से आगे बढ़ता ही नहीं।

ऐसे लोगों के पास अक्सर एक सफेद कुर्ता, सोशल मीडिया की सक्रियता और हर मौके पर मौजूद रहने वाला कैमरा जरूर होता है। उनका मूल मंत्र साफ है—सेवा उतनी ही, जितनी फोटो में अच्छी लगे। किसी गरीब को मदद देने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि सही एंगल से तस्वीर ली जाए, ताकि अगले दिन अखबार और सोशल मीडिया पर उनकी ‘दरियादिली’ चमक सके।

इन समाजसेवियों के साथ काम करने वाले युवाओं की स्थिति भी कम विडंबनापूर्ण नहीं होती। उन्हें सेवा के नाम पर बिना किसी मेहनताना के दिन-रात काम करवाया जाता है। जब वे अपने श्रम का मूल्य मांगते हैं, तो उन्हें ‘पुण्य’ और ‘परमार्थ’ का पाठ पढ़ाकर चुप करा दिया जाता है। इस तरह सेवा की आड़ में मुफ्त मजदूरी लेना एक आम प्रवृत्ति बनती जा रही है।

मदद के छोटे-से काम को भी बड़े आयोजन में बदल दिया जाता है। जरूरतमंद को कंबल या राशन देने से ज्यादा जोर मंच, बैनर और फोटो सेशन पर होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि मदद पाने वाला व्यक्ति घंटों इंतजार करता रहता है, सिर्फ इसलिए कि फोटो खिंचवाने का सही समय और भीड़ तैयार की जा सके। ऐसे दृश्य यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या सेवा सच में जरूरतमंद के लिए है या केवल छवि निर्माण के लिए।

कुछ लोग समाजसेवा को राजनीति में प्रवेश का शॉर्टकट भी मानते हैं। वे समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने के बजाय उन समस्याओं के साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाना ज्यादा जरूरी समझते हैं। नाले के पास खड़े होकर दुखी चेहरा बनाना, लेकिन उसे साफ करवाने के लिए कोई ठोस पहल न करना, इसी मानसिकता का उदाहरण है।

समाज को ऐसे दिखावटी सेवाभाव और वास्तविक सेवा के बीच फर्क समझने की जरूरत है। सच्ची मदद वह है, जो बिना शोर-शराबे और बिना प्रचार के की जाए। सेवा का मूल्य उसकी नीयत और प्रभाव से तय होना चाहिए, न कि उसके साथ जुड़े कैमरों और सुर्खियों से।

 

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