समाज में दानवीरों की चर्चा हमेशा सम्मान के साथ की जाती रही है। पुराने समय में दानवीर वह माना जाता था जो अपनी संपत्ति और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दूसरों की सहायता करता था। लेकिन आज के दौर में दान की परिभाषा बदलती हुई दिखाई देती है। अब कई ऐसे लोग सामने आते हैं जो पहले समाज की संपत्ति और संसाधनों का दुरुपयोग करते हैं और बाद में उसका एक छोटा हिस्सा दान देकर स्वयं को दानवीर साबित करने की कोशिश करते हैं।
आज के तथाकथित दानवीरों के लिए दान अक्सर पुण्य कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी छवि सुधारने का साधन बन जाता है। साल भर अनैतिक तरीकों से कमाई करने के बाद अचानक किसी मंदिर में बड़ा चढ़ावा चढ़ा दिया जाता है या किसी सामाजिक संस्था को सहायता दे दी जाती है। यह एक तरह से अपनी काली कमाई को ‘धोने’ की कोशिश जैसी प्रतीत होती है।
एक समय शास्त्रों में कहा गया था कि दान ऐसा होना चाहिए कि दाएं हाथ से दिया गया दान बाएं हाथ को भी पता न चले। लेकिन आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। यदि दान की जानकारी सोशल मीडिया, अखबारों और कैमरों तक न पहुंचे तो जैसे उसका कोई महत्व ही नहीं रह जाता। कई बार एक गरीब व्यक्ति को मामूली सहायता देने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग कैमरों के साथ मौजूद रहते हैं, ताकि उसकी तस्वीरें प्रचार का माध्यम बन सकें।
दरअसल यह पूरी प्रक्रिया एक तरह के ‘इकोसिस्टम’ की तरह काम करती है। पहले भ्रष्टाचार के जरिए बड़ी कमाई की जाती है, फिर उसका थोड़ा सा हिस्सा दान के रूप में दिया जाता है और बदले में उससे कई गुना ज्यादा प्रचार हासिल कर लिया जाता है। इस तरह दान एक सामाजिक सेवा से ज्यादा छवि निर्माण का साधन बन जाता है।
सच्चाई यह है कि दान का असली उद्देश्य समाज की भलाई और जरूरतमंदों की मदद करना होना चाहिए, न कि अपने गलत कार्यों पर पर्दा डालना। भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति पर दान की सफेद चादर डाल देने से सच्चाई नहीं बदलती। जैसे समुद्र में दो बूंद गंगाजल डाल देने से पूरा समुद्र पवित्र नहीं हो जाता, वैसे ही थोड़े से दान से बड़े अपराधों का प्रायश्चित नहीं हो सकता।