रायपुर। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकसंगीत कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाने वाले प्रसिद्ध बांस वादक विक्रम यादव का गुरुवार सुबह पांच बजे निधन हो गया। वे पिछले कई दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर से प्रदेश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार सुबह 11 बजे उनके गृह ग्राम खैरा में किया गया।
विक्रम यादव छत्तीसगढ़ की पारंपरिक बांस गीत कला के प्रमुख कलाकारों में शामिल थे। उन्होंने अपनी विशिष्ट वादन शैली के माध्यम से प्रदेश की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा को देश-विदेश तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। बांस, बांसुरी और बीन वादन में उनकी प्रतिभा ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।
नया थियेटर से शुरू हुआ सफर
विक्रम यादव वर्ष 1971 में प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर के नया थियेटर से जुड़े थे। इस मंच के साथ उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्हें विदेशों में भी छत्तीसगढ़ की लोककला का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्ष भी अपनी प्रस्तुति देकर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को गौरवान्वित किया।
वर्ष 2007 में वे अनुपरंजन पांडेय के बस्तर बैंड से जुड़े। इसके माध्यम से भी उन्होंने लोकसंगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की कला को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुए सम्मानित
लोककला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को विभिन्न सम्मानों के माध्यम से सराहा गया। वर्ष 2007 में उन्हें भुइयां सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके बाद वर्ष 2018 में मध्य प्रदेश शासन का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय तुलसी सम्मान प्रदान किया गया। इसी माह 4 अक्टूबर को उन्हें साकेत कला साधना सम्मान-2026 से भी नवाजा गया।
लोकसंगीत परंपरा को अपूरणीय क्षति
विक्रम यादव का निधन छत्तीसगढ़ की लोककला और पारंपरिक संगीत के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा लोकवाद्य कला के संरक्षण, प्रदर्शन और प्रचार-प्रसार को समर्पित किया। उनकी प्रस्तुतियों ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक मंच प्रदान किया। उनके योगदान और कला की विरासत को लंबे समय तक याद किया जाएगा।
