हरिद्वार। पितृ पक्ष के 16 दिनों में धर्मनगरी हरिद्वार में आस्था और श्रद्धा का माहौल है। भाद्रपद पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक चलने वाले इस पक्ष में देशभर से श्रद्धालु गंगा तट पहुंचकर अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर रहे हैं। हरकी पैड़ी, कुशावर्त घाट, सतीघाट और नारायणी शिला पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जा रही है।
पितृ कर्म के साथ इन दिनों पंचबली की परंपरा भी निभाई जा रही है। श्राद्ध के लिए तैयार भोजन का एक हिस्सा गाय, कौवा, श्वान, चींटी और देवी-देवताओं के लिए निकाला जाता है। नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी के अनुसार, इसके बाद ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य की परंपरा पूरी की जाती है।
सनातन परंपरा में गाय को सेवा और करुणा का प्रतीक माना गया है। यही वजह है कि कई परिवार श्राद्ध कर्म के बाद सबसे पहले गाय को रोटी खिलाते हैं। वहीं कौवे को पितरों का प्रतीक मानने की धार्मिक मान्यता है। यही कारण है कि लोग कौवों के लिए घरों की छतों और घाटों के आसपास अन्न-पानी रखते हैं और उनके आने की प्रतीक्षा करते हैं।
पंचबली की परंपरा का महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। गाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि जीवन का अहम हिस्सा रही है, जबकि कौवे जैविक अवशेषों को खाकर प्राकृतिक सफाई व्यवस्था में योगदान देते हैं।
पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन कराने, वस्त्र-अन्न दान करने और जरूरतमंदों की मदद करने की परंपरा भी जारी है। इस तरह पितृ पक्ष केवल कर्मकांड का अवसर नहीं, बल्कि पूर्वजों के स्मरण के साथ सेवा, करुणा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी देता है।
