चुनाव से पहले सीमांत की याद क्यों? गरिमा दसौनी ने सरकार से मांगा साढ़े नौ साल का हिसाब

देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने भाजपा सरकार की ओर से सीमांत जिलों में कैबिनेट बैठक आयोजित करने की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सीमांत जिले केवल चुनावी दौरों या फोटो खिंचवाने का विषय नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पलायन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से सीधे जुड़े हुए हैं।

गरिमा दसौनी ने कहा कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार सीमांत क्षेत्रों में कैबिनेट बैठक करने की तैयारी कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब इन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को दांडी-कंडी के सहारे कई किलोमीटर दूर अस्पताल पहुंचाना पड़ता था, तब सरकार कहां थी।

उन्होंने आरोप लगाया कि सीमांत गांवों में जंगली जानवरों का खतरा, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा रोजगार के सीमित अवसर लंबे समय से ग्रामीणों की समस्याएं बने हुए हैं। इन परिस्थितियों के कारण कई गांवों से पलायन हुआ और अनेक गांवों में आबादी लगातार कम हुई। उन्होंने कहा कि केवल किसी सीमांत जिले में कैबिनेट बैठक आयोजित करने से सीमांत क्षेत्र मजबूत नहीं हो सकता।

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि सीमांत क्षेत्र तभी मजबूत होंगे, जब स्थानीय युवाओं को रोजगार और आजीविका के अवसर मिलेंगे, मरीजों को उपचार के लिए दूर के जिला मुख्यालयों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और गांव सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा मोबाइल नेटवर्क जैसी मूलभूत सुविधाओं से जुड़े होंगे।

उन्होंने सरकार से कैबिनेट बैठक से पहले पिछले वर्षों की घोषणाओं का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने पूछा कि सीमांत क्षेत्रों के लिए की गई कैबिनेट घोषणाओं में से कितनी योजनाएं धरातल पर उतरीं और पलायन रोकने तथा स्थानीय रोजगार पैदा करने के लिए सरकार ने क्या ठोस परिणाम हासिल किए।

दसौनी ने यह भी सवाल उठाया कि कितने सीमांत गांवों में अभी भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और मोबाइल कनेक्टिविटी जैसी सुविधाओं की कमी है। युवाओं के लिए घोषित योजनाओं से कितने लोगों को वास्तविक रोजगार या आजीविका मिली, इसका आंकड़ा भी सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए।

उन्होंने जनवरी 2026 में राज्य सरकार और आईटीबीपी के बीच ‘स्वस्थ सीमा अभियान’ के तहत हुए समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के 108 सीमांत गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत करने की बात कही गई थी। अब सरकार को इस अभियान की वर्तमान स्थिति और इन गांवों तक पहुंची स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी भी देनी चाहिए।

गरिमा दसौनी ने कहा कि सीमांत गांवों को मजबूत करना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है। यदि सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार और संचार जैसी सुविधाओं के अभाव में लोग गांव छोड़ने को मजबूर होते हैं तो इन समस्याओं का समाधान प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।

उन्होंने मांग की कि कैबिनेट बैठक से पहले सीमांत क्षेत्रों में जन-सुनवाई की जाए और बैठक में लिए जाने वाले फैसलों के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए। साथ ही प्रत्येक जिले के लिए प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

दसौनी ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों के लोग घोषणाओं के बजाय उनके परिणाम देखना चाहते हैं। उन्होंने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि सीमांत जिलों में होने वाली कैबिनेट बैठकें जनहित की पहल हैं या 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी का हिस्सा। उन्होंने सवाल किया कि यदि चुनाव के समय सीमांत क्षेत्रों की याद आ रही है तो पिछले साढ़े नौ वर्षों में सरकार ने इन क्षेत्रों के लिए क्या किया।

 

 

Leave A Reply

Your email address will not be published.