शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) के कथित दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए एक याचिका खारिज कर दी। अदालत ने पाया कि ठेकेदारों के बीच व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता के मामले को जनहित का मुद्दा बनाकर अदालत के सामने पेश किया गया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से पहले जमा कराई गई दो लाख रुपये की राशि को जुर्माने के रूप में जब्त करने का आदेश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कांट्रेक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिका में एक ठेकेदार पर जालसाजी और सरकारी रिकॉर्ड में कथित हेरफेर के आरोप लगाते हुए सतर्कता जांच कराने तथा उसे सरकारी ठेकों से ब्लैकलिस्ट करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया था कि इस मामले में उसका कोई निजी हित नहीं है।
सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष ने याचिका की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए। अदालत के समक्ष सामने आया कि एसोसिएशन के अध्यक्ष ने प्रतिवादी के बेटे के नाम 20 लाख रुपये का चेक जारी किया था। यह चेक बाउंस हो गया था और इस मामले में आपराधिक कार्रवाई भी चल रही थी। इसके अलावा जिन सरकारी टेंडरों को लेकर याचिका में सवाल उठाए गए थे, उनमें याचिकाकर्ता के करीबी रिश्तेदारों की भी भागीदारी थी।
इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि मामला वास्तविक जनहित से अधिक व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता से जुड़ा प्रतीत होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका का उद्देश्य ऐसे लोगों या वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना है, जो अपनी स्थिति के कारण स्वयं न्यायालय का दरवाजा खटखटाने में सक्षम नहीं हैं। इसका इस्तेमाल निजी विवाद या कारोबारी प्रतिस्पर्धा को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने जमा दो लाख रुपये की राशि को जुर्माने के रूप में जब्त करते हुए इसे दो हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया। एक लाख रुपये हाईकोर्ट एम्प्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन फंड और एक लाख रुपये आईजीएमसी गरीब मरीज फंड में जमा कराए जाएंगे।