नई दिल्ली। भारत की करीब एक-तिहाई कृषि भूमि मिट्टी के क्षरण से प्रभावित हो चुकी है। एक हालिया रिपोर्ट में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉयल साइंस के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2024 तक देश में करीब 11.5 से 12 करोड़ हेक्टेयर भूमि की मिट्टी खराब हो चुकी थी। यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 33 प्रतिशत है। मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट का सीधा असर कृषि उत्पादकता, किसानों की आय और भविष्य की खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और भूजल की कमी जैसी चुनौतियां भी कृषि क्षेत्र के जोखिम को बढ़ा रही हैं। ऐसे में मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और खराब हो चुकी जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाने के लिए ‘रीजनरेटिव एग्रीकल्चर’ यानी पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देने की जरूरत बताई गई है।
पुनर्योजी कृषि का उद्देश्य केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरे कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है। इसके तहत कम जुताई, कवर क्रॉप्स, फसल चक्र में बदलाव, एग्रोफोरेस्ट्री और खेती के साथ पशुपालन जैसी तकनीकों को अपनाया जाता है। इन तरीकों से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने, पानी और पोषक तत्वों के बेहतर इस्तेमाल तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू करने में कई चुनौतियां हैं। शुरुआती लागत, किसानों को पर्याप्त ऋण और वित्तीय सहायता का अभाव, कार्बन एवं पर्यावरण बाजारों का सीमित विकास, कमजोर निगरानी व्यवस्था और शुरुआती दौर में उत्पादन घटने की आशंका प्रमुख बाधाओं में शामिल हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की कृषि सहायता को केवल खाद, बीज और अन्य इनपुट पर सब्सिडी तक सीमित रखने के बजाय परिणाम आधारित बनाया जाना चाहिए। मिट्टी में जैविक कार्बन, पानी की उत्पादकता, जैव विविधता और किसानों की आय में स्थिरता जैसे मानकों के आधार पर प्रोत्साहन देने से टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिल सकता है।