नई दिल्ली। भारत में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बीते कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है, लेकिन अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक समूहों को देखें तो तस्वीर काफी विविध नजर आती है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) आधारित अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं के काम करने के फैसले पर शिक्षा, आर्थिक स्थिति, विवाह, रोजगार के अवसर और सामाजिक परिस्थितियों का गहरा असर पड़ता है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई है। 2017-18 में यह दर 23.3 प्रतिशत थी। ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 48 प्रतिशत तक पहुंच गई है। हालांकि, पुरुषों की 78.8 प्रतिशत LFPR की तुलना में महिलाओं की भागीदारी अभी भी काफी कम है।
सरकारी आंकड़ों में धर्म के आधार पर सीधे LFPR उपलब्ध नहीं है। हालांकि, NFHS के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले अध्ययनों में धार्मिक समूहों के बीच रोजगार भागीदारी में अंतर सामने आया है। शोध के अनुसार, ईसाई और बौद्ध महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक, जबकि मुस्लिम और सिख महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम पाई गई है। हिंदू महिलाएं इन दोनों के बीच आती हैं।
मुस्लिम महिलाओं की कम श्रम भागीदारी के पीछे विवाह को एक प्रमुख कारण बताया गया है। शादी के बाद उनके रोजगार में बने रहने की संभावना कम हो जाती है। इसके अलावा, जिन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित हैं, वहां रहने और परिवार के भीतर लैंगिक असमानता जैसी परिस्थितियां भी महिलाओं के काम करने के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं। शहरी क्षेत्रों में भी मुस्लिम महिलाओं की श्रम बाजार भागीदारी अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई है।
वहीं, सिख महिलाओं के मामले में कारण अलग दिखाई देता है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, अपेक्षाकृत बेहतर पारिवारिक आर्थिक स्थिति महिलाओं को रोजगार से बाहर रहने का विकल्प देती है। इसे आय प्रभाव के रूप में देखा जाता है, जिसमें परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होने पर महिला के नौकरी करने की आवश्यकता कम हो सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में महिला रोजगार को समझने के लिए केवल आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और क्षेत्रीय परिस्थितियों को भी साथ में देखना जरूरी है।
