छह माह पहले ही चुनावी जंग तेज : धामी बनाम गोदियाल फ्रंट पर, संगठन पर्दे के पीछे

ममता सिंह
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव को अभी भले ही औपचारिक रूप से छह महीने से ज्यादा का समय माना जा रहा है, लेकिन सियासी पारा अभी से चढ़ गया है। भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी नोक-झोंक शुरू हो गई है और दोनों दलों में फ्रंट लाइन पर केवल दो चेहरे आमने-सामने हैं – मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल।

नौकरी पर सियासी वार-पलटवार

मुख्यमंत्री धामी ने पिछले दो दिनों में दो जनसभाओं में कांग्रेस के उस वादे पर सीधा हमला बोला, जिसमें कांग्रेस कह रही है कि सत्ता में आने पर हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी। धामी ने कहा, “कांग्रेस लोगों को बरगला रही है। क्या यह संभव है? प्रदेश में 15 लाख परिवार हैं, क्या 15 लाख नौकरियां हैं? कांग्रेस झूठे सपने दिखाकर युवाओं को भ्रमित कर रही है। हमने पारदर्शी भर्ती और रोजगार मेले के जरिए 25 हजार युवाओं को रोजगार दिया है, यह आंकड़ा है, जुमला नहीं।”

उधर कांग्रेस इस हमले को भुनाने में लगी है। कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा महंगाई, बेरोजगारी और बिगड़ती कानून व्यवस्था से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस के वादों पर सवाल उठा रही है। गोदियाल ने कहा, “आज उत्तराखंड में आटा-दाल के दाम आसमान पर हैं, बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाएं ध्वस्त हैं। मुख्यमंत्री को इसका जवाब देना चाहिए, न कि हमारे विजन पर सवाल।”

विशेषज्ञों का सवाल – संगठन कहां है?

दिलचस्प बात यह है कि यह पूरी लड़ाई केवल दो चेहरों तक सिमट गई है। भाजपा में मुख्यमंत्री धामी खुद ही सरकार और संगठन दोनों का मोर्चा संभाले हुए हैं, जबकि यह काम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और सांसदों का होना चाहिए। इसी तरह कांग्रेस में फ्रंट पर अकेले गणेश गोदियाल लड़ रहे हैं।

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “भाजपा में अध्यक्ष और सांसद चुनावी मोड में नहीं दिख रहे, सीएम को ही हर आरोप का जवाब देना पड़ रहा है। इससे संगठन कमजोर दिखता है। वहीं कांग्रेस में गोदियाल के अलावा कोई बड़ा नेता फ्रंट पर नहीं आ रहा। हरीश रावत, प्रीतम सिंह, यशपाल आर्य जैसे नेता अपने-अपने गुटों में व्यस्त हैं। अंदर खाने में टिकट मैनेजमेंट का खेल चल रहा है।”

अंदर खाने का खेल

सूत्र बताते हैं कि भाजपा में कई सांसद और विधायक दिल्ली में टिकट की लॉबिंग में हैं, इसलिए वे मैदान में सक्रिय नहीं हैं। कांग्रेस में भी स्थिति अलग नहीं है। गोदियाल के नेतृत्व में पार्टी एकजुट दिखाने की कोशिश कर रही है, लेकिन पीछे कई नेता अलग-अलग गिरोह बनाकर अपने समर्थकों के लिए टिकट पक्का करने में जुटे हैं।

कुल मिलाकर, चुनाव से पहले की यह सीधी जंग धामी बनाम गोदियाल बन गई है, जबकि दोनों दलों का संगठन अभी भी बैकफुट पर है।

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