देहरादून। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (एनसीजेडसीसी), प्रयागराज और ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, देहरादून के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार से चार दिवसीय लोक एवं जनजातीय कला कार्यशाला, प्रदर्शनी और चित्रकला प्रतियोगिता का शुभारंभ हुआ। ‘वन्दे मातरम्–150 वर्ष’ की थीम पर आधारित यह आयोजन 24 से 27 अगस्त तक चलेगा। इसमें देश की लोक एवं जनजातीय कला से जुड़े कलाकारों के साथ छात्र और कला प्रेमी भी हिस्सा ले रहे हैं।
उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. बीकेएस संजय ने कहा कि चित्रकला केवल रंगों और रेखाओं का मेल नहीं, बल्कि एक साधना है। युवाओं में कला के प्रति रुचि विकसित करना समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कला की अपनी एक प्रभावशाली भाषा होती है, जो बिना शब्दों के भी भावनाओं को लोगों तक पहुंचाती है।
डॉ. संजय ने कहा कि लोक कला हमें अपनी प्रकृति, संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है। देश के विकास के लिए लोगों के दृष्टिकोण में कलाकार जैसी संवेदनशीलता और मानवीयता होना जरूरी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि कार्यशाला के दौरान कलाकार अपनी विशिष्ट शैलियों में नई कलाकृतियां तैयार करेंगे और एक-दूसरे की कला परंपराओं तथा तकनीकों को समझने का अवसर पाएंगे।
विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर सुशील उपाध्याय ने कहा कि कलाकार का किसी वस्तु या परिस्थिति को देखने का नजरिया सामान्य व्यक्ति से अलग होता है। उन्होंने छात्र कलाकारों से कहा कि कला एक साधना है, जिसमें धैर्य और निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है। उन्होंने युवा कलाकारों को वेन गॉग, एमएफ हुसैन, अमृता शेरगिल और रवि परांजपे जैसे प्रसिद्ध कलाकारों की कृतियों का अध्ययन करने की सलाह दी।
ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी के शैक्षणिक अधिष्ठाता डॉ. प्रमोद एस. नायर ने कहा कि प्रदर्शनी में कार्यशाला के दौरान तैयार कलाकृतियां प्रदर्शित की जाएंगी। चित्रकला प्रतियोगिता में प्रतिभागी ‘वन्दे मातरम्’ की भावना, उसके ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पण को कैनवास पर उकेरेंगे।
कार्यशाला समन्वयक डॉ. कृष्ण कुमार ने बताया कि आयोजन में भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, प्रकृति, परंपराओं और राष्ट्रप्रेम के विभिन्न आयामों को कला के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन पारंपरिक कला विधाओं के संरक्षण के साथ युवा कलाकारों को नई रचनात्मक दिशा देने का भी प्रयास है।