देवभूमि में ‘बिगड़’ रहा जनता का मिजाज

 पौड़ी गढ़वाल में महेंद्र भट्ट के काफिले को रोककर जनता के विरोध से गर्मायी  राजनीति 

 बुनियादी विकास की धीमी रफ्तार से नाराज पर्वतीय क्षेत्र के लोग सड़क पर उतरे

 भर्ती विवाद और घोटालों से सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर उठे गंभीर सवाल

-ममता सिंह/देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में इन दिनों राजनीतिक पारा काफी गर्म है। पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में बुनियादी विकास, सड़क निर्माण और पुल की मांग को लेकर स्थानीय प्रदर्शनकारियों और उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट के काफिले को रोकने और गाड़ी के आगे लेटने की घटना ने राज्य की जमीनी हकीकत को पूरी तरह सतह पर ला दिया है। यह तीखा विरोध केवल एक राजनीतिक घटनाक्रम या किसी खास दल का विरोध नहीं है, बल्कि यह देवभूमि के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में लंबे समय से पनप रहे व्यापक जन-आक्रोश का एक स्पष्ट और बड़ा संकेत है।

पहाड़ी इलाकों में बुनियादी विकास की कछुआ चाल को लेकर स्थानीय लोगों का धैर्य अब पूरी तरह जवाब दे चुका है। सत्ता के सबसे बड़े संगठनात्मक चेहरे महेंद्र भट्ट के सामने जनता का इस कदर सड़क पर उतरना साफ जाहिर करता है कि लोग अब केवल चुनावी वादों और कागजी आश्वासनों से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। भले ही सत्ता पक्ष इसे विपक्ष का प्रायोजित ड्रामा या महज एक राजनीतिक स्टंट करार देकर खारिज करने की कोशिश करे, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह गुस्सा मंत्रियों और विधायकों की कार्यशैली के खिलाफ है। यदि समय रहते जनता की मूलभूत समस्याओं को दूर नहीं किया गया, तो जनप्रतिनिधियों को आगामी चुनावी दौर में ग्रामीण इलाकों में घुसने से पहले जनता के तीखे सवालों और सीधे नागरिक विरोध का तीखा सामना करना पड़ेगा।

उत्तराखंड में ‘जीरो टॉलरेंस’ के बड़े-बड़े दावों के बीच प्रशासनिक मशीनरी में लगातार सामने आ रहे घोटाले और भर्ती परीक्षाओं के विवादों ने सरकार की साख को गंभीर चोट पहुंचाई है। रोजगार के अवसरों की भारी कमी, अवैध खनन की बढ़ती शिकायतें और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में पारदर्शिता का अभाव अब छिपा नहीं है। राज्य का युवा और आम नागरिक खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा है, जिससे सरकार की नीतियों और व्यवस्था के प्रति जनता की नाराजगी हर गुजरते दिन के साथ और अधिक गहरी होती जा रही है।

उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि यहां की जनता बदलाव को गले लगाने और सबक सिखाने में जरा भी देर नहीं लगाती। बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी और भ्रष्टाचार के मामलों पर उमड़ रहा यह जन-आक्रोश आगामी विधानसभा चुनाव की राजनीतिक दिशा को तय करने की पूरी क्षमता रखता है। यह घटना सत्ताधारी दल के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि अब जनता को केवल आश्वासनों की घुट्टी नहीं पिलाई जा सकती। अगर सरकार ने समय रहते अपने मंत्रियों और विधायकों की जवाबदेही तय नहीं की और धरातल पर बदलाव नहीं दिखाया, तो आगामी चुनावी चौखट पर पार्टी को इसका भारी राजनीतिक और चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.