न पूंजीवाद, न समाजवाद! आखिर किस नई आर्थिक सोच की ओर बढ़ रही है Gen-Z?

नई दिल्ली। दुनिया भर में जेनरेशन-ज़ेड (Gen-Z) की आर्थिक और राजनीतिक सोच तेजी से बदल रही है। वर्ष 2000 के बाद जन्मी यह पीढ़ी पारंपरिक विचारधाराओं के दायरे से बाहर निकलकर ऐसे व्यावहारिक समाधान तलाश रही है, जो सीधे तौर पर आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं को कम कर सकें। यही वजह है कि आज की युवा पीढ़ी न तो पूरी तरह पूंजीवाद के पक्ष में खड़ी नजर आती है और न ही पारंपरिक समाजवादी मॉडल को अपनाने के लिए तैयार दिखती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जेन-ज़ेड की सोच एक मिश्रित आर्थिक मॉडल की ओर इशारा करती है, जिसमें मुक्त बाजार की ताकत और सरकारी हस्तक्षेप दोनों को महत्वपूर्ण माना जाता है। युवाओं की प्राथमिकता वैचारिक बहसों से अधिक महंगाई, बढ़ते किराए, रोजगार और जीवन-यापन की लागत जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। यही कारण है कि यह पीढ़ी ऐसी नीतियों का समर्थन कर रही है, जो आम नागरिकों को तत्काल राहत प्रदान कर सकें।

जेन-ज़ेड की प्रमुख मांगों में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं, आवास किराए को नियंत्रित करने की व्यवस्था, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की निगरानी और सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाना शामिल है। आर्थिक अनिश्चितता और लगातार बढ़ती महंगाई के बीच युवा वर्ग सरकारों से अधिक सक्रिय और जवाबदेह भूमिका निभाने की अपेक्षा कर रहा है।

तकनीकी क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का बढ़ता प्रभाव भी युवाओं की सोच को प्रभावित कर रहा है। कई युवाओं को आशंका है कि स्वचालन और एआई भविष्य में पारंपरिक नौकरियों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में नौकरी सुरक्षा, कौशल विकास कार्यक्रम और रोजगार सृजन जैसी नीतियों को लेकर समर्थन बढ़ रहा है। युवा चाहते हैं कि सरकारें और संस्थान बदलते समय के अनुरूप नई पीढ़ी को तैयार करने के लिए ठोस कदम उठाएं।

आर्थिक असमानता का मुद्दा भी जेन-ज़ेड की प्राथमिकताओं में शामिल है। यह वर्ग मानता है कि अत्यधिक संपत्ति के केंद्रीकरण को रोकने के लिए अमीर वर्ग और लक्ज़री उपभोग पर अधिक कर लगाए जा सकते हैं। उनके अनुसार, इन संसाधनों का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुविधाओं को बेहतर बनाने में किया जाना चाहिए।

भारत में भी जेन-ज़ेड सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक दिखाई दे रही है। यह पीढ़ी केवल अच्छी सैलरी वाले रोजगार की तलाश नहीं कर रही, बल्कि उन कंपनियों और संस्थानों को भी महत्व दे रही है जो सामाजिक जिम्मेदारी और सकारात्मक बदलाव में योगदान देते हैं।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक जेन-ज़ेड भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग और प्रभावशाली कार्यबल बन सकती है। ऐसे में इसकी बदलती सोच आने वाले वर्षों में न केवल आर्थिक नीतियों, बल्कि वैश्विक राजनीति की दिशा भी तय कर सकती है। यह पीढ़ी विचारधाराओं की बजाय व्यावहारिक समाधान और सामाजिक संतुलन को अधिक महत्व देती हुई नजर आ रही है।

 

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