वाशिंगटन। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की नई वर्ल्ड ओशियन असेसमेंट रिपोर्ट ने समुद्री पर्यावरण को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में समुद्र के जलस्तर बढ़ने की रफ्तार दोगुनी हो गई है, जबकि प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक औद्योगिक मछली पकड़ने की गतिविधियों ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर अभूतपूर्व दबाव पैदा कर दिया है।
86 देशों के 600 से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में वर्ष 2021 से 2025 के बीच महासागरों की स्थिति का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट बताती है कि 2015 से पहले समुद्र का जलस्तर औसतन 2 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा था, लेकिन 2023 तक यह बढ़कर 4.3 मिलीमीटर प्रतिवर्ष पहुंच गया। यह संकेत है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब तेजी से दिखाई देने लगा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, महासागरों का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 1955 के बाद समुद्र में जितनी गर्मी दर्ज की गई, उसका लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा केवल 2018 के बाद के वर्षों में रिकॉर्ड किया गया है। विशेष रूप से अटलांटिक, हिंद और दक्षिणी प्रशांत महासागर सबसे तेजी से गर्म हो रहे हैं।
रिपोर्ट में समुद्री प्रदूषण को भी बड़ी चुनौती बताया गया है। अनुमान के अनुसार, हर साल लगभग 52.1 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में पहुंच रहा है। इससे 24.4 ट्रिलियन माइक्रोप्लास्टिक कण समुद्री जल में फैल चुके हैं, जो 4,000 से अधिक समुद्री प्रजातियों के लिए खतरा बन गए हैं। कई समुद्री जीव प्लास्टिक निगलने के कारण मर रहे हैं, जिससे समुद्री जैव विविधता प्रभावित हो रही है।
यूएन महासचिव António Guterres ने रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए कहा कि महासागरों को असीमित संसाधन मानने की सोच बदलनी होगी। उन्होंने सभी देशों से विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर समुद्री संरक्षण के लिए संयुक्त प्रयास करने की अपील की।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की एक-तिहाई आबादी समुद्र तट से 100 किलोमीटर के दायरे में रहती है, जबकि लगभग 11 प्रतिशत आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जो समुद्र तल से 10 मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। ऐसे में बढ़ता जलस्तर भविष्य में करोड़ों लोगों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो समुद्री संकट वैश्विक पर्यावरण और मानव जीवन दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।