नई दिल्ली। ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित सिमलीपाल बायोस्फीयर रिजर्व की तलहटी से पुरातत्व वैज्ञानिकों को एक ऐसी दुर्लभ खोज मिली है, जिसने प्रारंभिक मध्यकालीन भारत के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने के नए रास्ते खोल दिए हैं। आकर्शिला नामक स्थल पर 7वीं-8वीं शताब्दी की शैल नक्काशियों (रॉक एनग्रेविंग्स) का पता चला है, जिन्हें विशेषज्ञ क्षेत्र की महत्वपूर्ण पुरातात्विक उपलब्धि मान रहे हैं।
प्राकृतिक चट्टानों पर उकेरी गई इन नक्काशियों में मानव आकृतियां, पशु चित्र, प्रतीकात्मक चिह्न और प्राचीन शिलालेख शामिल हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये कलाकृतियां उस दौर की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की झलक प्रस्तुत करती हैं। यह वह समय था जब गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद विभिन्न क्षेत्रीय राजवंश अपने प्रभाव का विस्तार कर रहे थे और कला व धर्म को नया स्वरूप दे रहे थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यहां मिले साक्ष्य सूर्य पूजा समेत कई धार्मिक परंपराओं की ओर संकेत करते हैं। कुछ नक्काशियां उस समय के लोगों के पहनावे, दैनिक जीवन और प्रकृति के साथ उनके संबंधों को भी दर्शाती हैं। स्थल पर एक नक्काशीदार पत्थर की प्रतिमा भी मिली है, जो भगवान गणेश के स्वरूप से मिलती-जुलती दिखाई देती है। दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय लोग आज भी इस प्रतिमा की पूजा करते हैं तथा सिंदूर, तेल और धूप-अगरबत्ती अर्पित करते हैं। इससे हजार वर्षों से अधिक पुरानी सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण मिलता है।
करीब 500 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले इस स्थल पर मिले शिलालेख इतिहासकारों के लिए विशेष रुचि का विषय बने हुए हैं। इनमें प्रयुक्त लिपि पूर्वी भारत की प्रारंभिक लेखन परंपराओं से मिलती-जुलती बताई जा रही है।
मयूरभंज की बूढ़ाबलंगा नदी घाटी पहले से ही प्रागैतिहासिक अवशेषों और प्राचीन बस्तियों के लिए प्रसिद्ध रही है, लेकिन इस क्षेत्र में इतने बड़े शैल कला स्थल की खोज पहली बार हुई है। आकर्शिला की खोज ने पाषाण काल से लेकर प्रारंभिक मध्यकालीन युग तक की ऐतिहासिक कड़ियों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह खोज साबित करती है कि सिमलीपाल क्षेत्र केवल जैव विविधता का केंद्र ही नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से मानव सभ्यता और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।